| | سپهبد نبیسنده را پیش خواند | | دل آگنده بودش همه برفشاند | |
| | یکی نامه فرمود نزدیک سام | | سراسر نُوید و درود و پَیام | |
| | ز خط نُخُست آفرین گسترید | | بران دادگر کافرین آفرید | |
| | ازو دید شادی و زو جُست زور | | خداوند ناهید و کیوان و هور | |
| 615 | خداوند هست و خداوند نیست | | همه بندگانیم و ایزد یکیست | |
| | ازو باد بر سام نیرم درود | | خداوند کوپال و شمشیر و خود | |
| | چماننده ی دیزه هنگام گرد | | چراننده ی کرگس اندر نبرد | |
| | فزاینده ی بادِ آوردگاه | | فشاننده ی تیغ از ابر سیاه | |
| | گراینده ی تاج و زرّین کمر | | نشاننده ی زال بر تخت زر | |
| 620 | به مردی هنر در هنر ساخته | | خرد از هنرها برفرّخته | |
| | من او را بسان یکی بنده ام | | به مهرش روان و دل آگنده ام | |
| | ز مادر بزادم بدانسان که دید | | ز گردون به من بر ستم ها رسید | |
| | پدر بود در ناز و خزّ و پرند | | مرا برده سیمرغ بر کوه هند | |
| | نیازم بدان کو شکار آورد | | ابا بچّگان در شمار آورد | |
| 625 | همی پوست از باد بر من بسوخت | | زمان تا زمان خاک چشمم بدوخت | |
| | همی خواندندی مرا پور سام | | به اورنگ بر سام و من در کُنام | |
| | چو یزدان چُنین راند اندر بُوِش | | برین گونه پیش آوریدم روش | |
| | کس از داد یزدان نیابد گریغ | | اگر خود بپرّد برآید به میغ | |
| | سنان ار به دندان بخاید دِلیر | | بدرّد از آواز او چرم شیر | |
| 630 | گرفتار فرمان یزدان بود | | وُگر چند دندانْش سندان بود | |
| | یکی کار پیش آمدم دل شکن | | که نتوان ستودنْش بر انجمن | |
| | پدر گر دِلیرست و نر اَژدهاست | | اگر بشنود راز کهتر رواست | |
| | من از دخت مهراب گریان شدم | | چو بر آتش تیز بریان شدم | |
| | ستاره شب تیره یار من ست | | من آنم که دریا کنار من ست | |
| 635 | به رنجی رسیده سْتم از خویشتن | | که بر من بگرید همی انجمن | |
| | اگر چه دلم دید چندین ستم | | نخواهم زدن جز به فرمانْت دم | |
| | چه فرماید اکنون جهان پهلَوان | | گشایم ازین رنج و سختی روان | |
| | سپهبد شنید آنک موبد چه گفت | | که گوهر گشاده کنید از نهفت | |
| | ز پیمان نگردد سپهبد پدر | | بدین کار دستور باشد مگر | |
| 640 | که من دخت مهراب را جفت خویش | | کنم راستی را به آیین و کیش | |
| | به پیمان چُنین رفت پیش گروه | | چو بازآوریدم ز البرزکوه | |
| | که هیچ آرزو بر دلت نگسلم | | کنون اندرین ست بسته دلم | |
| | | | | |
| | سُواری به کردار آذرگشسپ | | ز کاول سُوی سام شد بر سه اسپ | |
| | بفرمود گفت : ار بماند یکی | | نباید ترا دم زدن اندکی | |
| 645 | به دیگر پلنگ اندرآی و بَروْ | | بدینسان همی تاز تا پیش گَوْ | |
| | فرستاده در پیش او باد گشت | | به زیر اندرش چرمه پولاد گشت | |
| | چو نزدیکی گرگساران رسید | | یکایک ز دورش سپهبد بدید | |
| | همی گشت گرد یکی کوهسار | | چماننده یوز و رمنده شکار | |
| | چُنین گفت با غمگساران خویش | | بدان کاردیده سُواران خویش | |
| 650 | که آمد سُواری دمان کاولی | | همان چرمه یی زیر او زاولی | |
| | فرستاده ی زال باشد درست | | ازو آگهی جست باید نُخُست | |
| | ز دستان و ایران و از شهریار | | همه کرد باید سَخُن خواستار | |
| | هم اندر زمان پیش او شد سُوار | | به دست اندرون نامه ی نامدار | |
| | فرود آمد و خاک را بوسه داد | | بسی از جهان آفرین کرد یاد | |
| 655 | بپرسید و بِستَد ازو نامه سام | | فرستاده گفت آنچ بود از پَیام | |
| | سپهدار بگشاد از آن نامه بند | | فرود آمد از تیغ ِکوهِ بلند | |
| | سَخُن های دستان یکایک بخواند | | بپژمرد و بر جای خیره بماند | |
| | پسندش نیامد چُنان آرزوی | | دگرگونه بایستش او را به خوی | |
| | چُنین داد پاسخ که آمد پدید | | سَخُن هر چه از گوهر بد سَزید | |
| 660 | چو مرغ ژیان باشد آموزگار | | چُنین کام دل جوید از روزگار | |
| | ز نخچیر کامد سُوی خانه باز | | به دلش اندر اندیشه آمد دراز | |
| | همی گفت : اگر گویم این نیست رای | | مکن داوری ، سوی دانش گرای | |
| | دل شهریاران سر ِانجمن | | شود خام گفتار و پیمان شکن | |
| | وُگر گویم آری و کامت رواست | | بپرداز دل را بدانچت هواست | |
| 665 | ازین مرغ پرورده ، وان دیوزاد | | چگونه برآید ، چه گویی ، نژاد ؟ | |
| | سرش گشت از اندیشه ی دل گران | | بخفت و برآسوده گشت اندران | |
| | سَخُن هر چه بر بنده دشخوارتر | | دلش خسته تر زان و تن زارتر | |
| | گشاده تر آن باشد اندر نهان | | که فرمان دهد کردگار جهان | |
| | | | | |
| | چو برخاست از خواب ، با موبدان | | یکی انجمن کرد با بخردان | |
| 670 | گشاد آن سخن بر ستاره شُمَر | | که فرجام این بر چه باشد گذر | |
| | دو گوهر چو آب و چو آتش بهم | | برآمیختن باشد از بُن ستم | |
| | همانا که باشد به روز شمار | | فریدون و ضحّاک را کارزار | |
| | از اختر بجویید و پاسخ دهید | | سر خامه بر بخش فرّخ نهید | |
| | ستاره شناسان به روز دراز | | همی زآسمان باز جستند راز | |
| 675 | بدیدند و با خنده پیش آمدند | | که دو دشمن از بخش ، خویش آمدند | |
| | به سام نریمان ستاره شُمَر | | چُنین گفت کای گرد زرّین کمر | |
| | ترا مژده از دخت مهراب و زال | | که گردند هر دو دو فرّخ هَمال | |
| | ازین دو هنرمند ، پیلی ژیان | | بیاید ببندد به مردی میان | |
| | جهانی بپای اندرآرد به تیغ | | نهد تخت شاه از بر پشت میغ | |
| 680 | ببرّد پی بدسگالان ز خاک | | به روی زمین بر نماند مَغاک | |
| | نه سگسار ماند نه مازندران | | زَمین را بشوید به گرز گران | |
| | به خواب اندرآرد سر دردمند | | ببندد در ِجنگ و راه گزند | |
| | بدو باشد ایرانیان را امید | | ازو پهلَوان را خِرام و نُوید | |
| | پی باره یی کو چماند به جنگ | | بمالد برو روی جنگی پلنگ | |
| 685 | خُنُک پادشاهی که هنگام اوی | | زمانه به شاهی برد نام اوی | |
| | چو بشنید گفتار اخترشناس | | بخندید و پذرفت ازیشان سپاس | |
| | ببخشیدشان بی کران زرّ و سیم | | چو آرامش آمد به هنگام بیم | |
| | | | | |
| | فرستاده ی زال را پیش خواند | | ز هرگونه با او سَخُن ها براند | |
| | بگفتش که با او به چربی بگوی | | که این آرزو را نبُد هیچ روی | |
| 690 | ولیکن چو پیمان چُنین بُد نُخُست | | بهانه نشاید به بیداد جست | |
| | من اینک به شبگیر ازین رزمگاه | | سُوی شهر ایران گذارم سپاه | |
| | فرستاده را داد چندی درم | | بدو گفت : خیره مزن هیچ دم | |
| | ببستند از آن گرگساران هزار | | پیاده به خواری کشیدند زار | |
| | دو بهره چو از تیره شب درگذشت | | خروش سُواران برآمد ز دشت | |
| 695 | همان ناله ی کوس با کرّهَ نای | | برآمد ز دهلیز پرده سرای | |
| | سپهبد سُوی شهر ایران کشید | | سپه را بنزد دلیران کشید | |
| | فرستاده آمد دمان سُوی زال | | ابا بخت پیروز و فرّخنده فال | |
| | گرفت آفرین زال بر کردگار | | بران بخشش گردش روزگار | |
| | درم داد و دینار درویش را | | نوازنده شد مردم خویش را | |
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| 700 | میان سپهدار و آن سروبُن | | زنی بود گویا و شیرین سَخُن | |
| | پَیام آوریدی سُوی پهلَوان | | هم از پهلَوان سوی سرو روان | |
| | سپهدار دستان مرو را بخواند | | سَخُن هر چه بشنید با او براند | |
| | بدو گفت : نزدیک رودابه شو | | بگویش که ای نیکدل ماه نو | |
| | سَخُن چون ز تنگی به سختی رسید | | فرّخیش را زود بینی کَلید | |
| 705 | فرستاده بازآمد از پیش سام | | ابا شادمانی و فرّخ پَیام | |
| | بسی گفت و بشنید و زد داستان | | سرانجام هم گشت همداستان | |
| | سبک پاسخ نامه زن را سپرد | | زن از پیش او بازگشت و ببرد | |
| | بنزدیک رودابه آمد چو باد | | بدین شادمانی وُرا مژده داد | |
| | پری روی بر زن درم برفشاند | | به کرسیّ زرپیکرش برنشاند | |
| 710 | یکی شاره سربند پیش آورید | | شده تار و پود اندرو ناپدید | |
| | همه پیکرش سرخ یاقوت و زر | | شده زر همه ناپدید از گهر | |
| | یکی جفت پُرمایه انگشتری | | فروزنده چون بر فلک مشتری | |
| | فرستاد نزدیک دستان سام | | بسی داد با آن درود و پیام | |
| | زن از حجره بمْیان ایوان رسید | | نگه کرد سیندخت او را بدید | |
| 715 | زن از بیم او گشت چون سَندَروس | | بترسید و روی زَمین داد بوس | |
| | پر اندیشه شد جان سیندخت ازوی | | به آواز گفت : از کجایی بگوی | |
| | زمان تا زمان پیش من بگذری | | به حجره درآیی به من ننگری | |
| | دل روشنم بر تو شد بدگُمان | | نگویی مرا تا زهی گر کمان | |
| | بدو گفت زن : من یکی چاره جوی | | همی نان فرازآرم از چند روی | |
| 720 | بدین حجره رودابه پیرایه خواست | | همان گوهران گرانمایه خواست | |
| | بیاوردمش افسری زرنگار | | یکی حلقه پرگوهر شاهوار | |
| | بدو گفت سیندخت : بنماییم | | دل بسته زاندیشه بگشاییم | |
| | سپردم به رودابه - گفت - این دو چیز | | فزون خواست ، اکنون بیارمْش نیز | |
| | بها گفت بگذار بر چشم من | | یکی آب زن بر سر خشم من | |
| 725 | درم - گفت - فردا دهد ماه روی | | بها تا نیابم تو از من مجوی | |
| | همی کژّ دانست گفتار اوی | | بیاراست دل را به پیگار اوی | |
| | بیامد بجستش بر و آستی | | همی جست ازو کژّی و کاستی | |
| | چُن آن جامه های گرانمایه دید | | هم از دست رودابه پیرایه دید | |
| | در کاخ بر خویشتن بر ببست | | از اندیشگان شد بکردار مست | |
| 730 | بفرمود تا دخترش رفت پیش | | همی دست برزد به رخسار خویش | |
| | دو گل را به دو نرگس خواب دار | | همی شست تا شد گلان آب دار | |
| | به رودابه گفت ای سرافراز ماه | | گُزین کردی از ناز بر گاه چاه | |
| | چه ماند از نکو داشتی در جهان | | که ننمودمت آشکار و نهان | |
| | ستمگر چرا گشتی ای ماه روی | | همه رازها پیش مادر بگوی | |
| 735 | که این زن ز پیش که آید همی | | بنزدت ز بهر چه آید همی | |
| | سَخُن بر چه سانست و این مرد کیست | | که زیبای سربند و انگشتریست | |
| | ز گنج بزرگ افسر تازیان | | به ما ماند بسیار سود و زیان | |
| | بدین نام بد دادخواهی به باد | | چو من زاده ام دخت ، هرگز که زاد | |
| | زَمین دید رودابه و پشت پای | | فرو ماند از شرم مادر بجای | |
| 740 | فرو ریخت از دیدگان آب مهر | | به خون دو نرگس بیاراست چهر | |
| | به مادر چُنین گفت کای پر خرد | | همی مهر جان مرا بشکرد | |
| | مرا مام فرّخ نزادی زبُن | | نرفتی ز من نیک یا بد سَخُن | |
| | سپهدار دستان به کابل بماند | | چُنین مهر اویم بر آتش نشاند | |
| | چُنان تنگ شد بر دلم بر جهان | | که گریان شدم ز آشکار و نهان | |
| 745 | نخواهم بُدن زنده بی روی او | | جهانم نیرزد به یک موی او | |
| | بدان ! کو مرا دید و با من نشست | | به پیمان گرفتیم دستش بدست | |
| | فرستاده شد نزد سام بزرگ | | فرستاد پاسخ به زال سُتُرگ | |
| | زمانی بپیچید و دستور بود | | سَخُن های بایسته گفت و شُنود | |
| | فرستاده را داد بسیار چیز | | شنیدم همه پاسخ نامه نیز | |
| 750 | بدست همین زن که کندیش موی | | زدی بر زَمین و کشیدی بروی | |
| | فرستاده آرنده ی نامه بود | | مرا پاسخ نامه آن جامه بود | |
| | فروماند سیندخت از آن گفت اوی | | پسند آمدش زال را جفت اوی | |
| | چُنین داد پاسخ که این خُرد نیست | | چو دستان ز پرمایگان گرد نیست | |
| | بزرگست پور جهان پهلَوان | | همش نام و هم رای و روشن روان | |
| 755 | هنرها همه هست و آهو یکی | | که گردد هنر پیش او اندکی | |
| | شود شاه گیتی ازین خشمناک | | ز کاول برآرد به خورشید خاک | |
| | نخواهد که از تخم ما بر زَمین | | کسی پای خوار اندرآرد به زین | |
| | رها کرد زن را و بنواختش | | چُنان کرد پیدا که نشناختش | |
| | چُنان دید دخترش را در نهان | | کجا نشنود پند کس در جهان | |
| 760 | بیامد به تیمار و تنها بخفت | | همی پوست بر تنْش گفتی بکَفت | |
| | | | | |
| | بیامد ز درگاه مهراب شاد | | کزو کرده بُد زال بسیار یاد | |
| | گرانمایه سیندخت را خفته دید | | رخش پژمریده ، دل آشفته دید | |
| | بپرسید و گفتش چه بودت بگوی | | چرا پژمریدی چو گلبرگ روی | |
| | چُنین داد پاسخ به مهراب باز | | که اندیشه اندر دلم شد دراز | |
| 765 | ازین کاخ آباد و این خواسته | | وُزین تازی اسپان آراسته | |
| | وُزین ریدکان سپهبدپرست | | وُزین باغ و این خسروانی نشست | |
| | وُزین چهره و سرو بالای ما | | وُزین نام و این دانش و رای ما | |
| | بدین آبداری و این راستی | | زمان تا زمان آیدش کاستی | |
| | به ناکام باید به دشمن سپرد | | همه رنج ما باد باید شمرد | |
| 770 | یکی تنگ صندوق ازین بهر ماست | | درختی که تِریاک او زهر ماست | |
| | بکشتیم و دادیم آبش به رنج | | بیاویختیم از برش تاج و گنج | |
| | چو برشد به خورشید و شد سایه دار | | به خاک اندرآمد سر مایه دار | |
| | برینست فرجام و انجام ما | | بدان تا کجا باشد آرام ما | |
| | به سیندخت مهراب گفت این سَخُن | | نو آوردی و نو نگردد کَهُن | |
| 775 | سرای سپنجی برینسان بود | | خرد یافته زو هراسان بود | |
| | یکی اندرآید دگر بگذرد | | گذر نی که چرخش همی بسپَرد | |
| | به تنگی دل و غم ، نگردد دگر | | بدین نیست پَیگار با دادگر | |
| | بدو گفت سیندخت کین داستان | | بروی دگر برنهد راستان | |
| | خرد یافته موبد نیک بخت | | به فرزند زد داستان درخت | |
| 780 | زدم داستان تا ز راه خرد | | سپهبد به گفتار من بنگرد | |
| | فرو برد سرو سهی داد خم | | به نرگس گل سرخ را داد نم | |
| | که گردون بسر بر چُنان نگذرد | | که ما را همی باید ای پر خرد | |
| | چُنان دان که رودابه را پور سام | | نهانی نهاده ست هرگونه دام | |
| | ببرده ست روشن دل او ز راه | | یکی چاره مان کرد باید نگاه | |
| 785 | بسی دادمش پند و سودش نکرد | | دلش خیره بینم همی ، روی زرد | |
| | چو بشنید مهراب بر پای جست | | نهاد از بر دست شمشیر دست | |
| | تنش گشت لرزان و رخ لاژورد | | پر از خون جگر ، دل پر از باد سرد | |
| | همی گفت رودابه را رود خون | | بروی زَمین برکنم هم کنون | |
| | چُن آن دید سیندخت بر پای جست | | کمر کرد بر گِردگاهش دو دست | |
| 790 | چُنین گفت کز کهتر اکنون یکی | | سَخُن بشنو و گوش دار اندکی | |
| | وُزان پس همان کن که رای آیدت | | روان و خرد رهنمای آیدت | |
| | بپیچید و انداخت او را بدست | | خروشی برآورد چون پیل مست | |
| | مرا - گفت - چون دختر آمد پدید | | ببایستش اندر زمان سر برید | |
| | نکشتم نرفتم به راه نیا | | کنون ساخت بر من چُنین کیمیا | |
| 795 | پسر کو ز راه پدر بگذرد | | دِلیرش ز پشت پدر نشمرد | |
| | یکی داستان زد برین بر پلنگ | | بدانگه که در جنگ شد تیز چنگ | |
| | مرا کارزارست گفت آرزوی | | پدرْم از نیا خود همین داشت خوی | |
| | نشان پدر باید اندر پسر | | روا باشد ار کمتر آرد هنر | |
| | همم بیم جانست وهم جای ننگ | | چرا بازداری سرم را ز جنگ | |
| 800 | اگر سام یل با منوچهر شاه | | بیابند بر ما یکی دستگاه | |
| | ز کاول برآید به خورشید دود | | نه آباد ماند نه کشت و درود | |
| | چُنین گفت سیندخت با مرزبان | | کزین در مگردان به خیره زبان | |
| | کزین آگهی یافت سام سُوار | | به دل ترس و تیمار چندین مدار | |
| | وی از گرگساران بدین گشت باز | | گشاده شدهَ ست این سَخُن ، نیست راز | |
| 805 | چُنین گفت مهراب کای ماه روی | | سَخُن هیچ با من به کژّی مگوی | |
| | چُنین خود کی اندرخورد با خرد | | که مر خاک را باد فرمان برد | |
| | مرا دل بدین نیستی دردمند | | اگر ایمنی یابمی از گزند | |
| | که باشد که پیوند سام سُوار | | نخواهد ، ز اهواز تا قندهار | |
| | بدو گفت سیندخت کای سرفراز | | به گفتار کژّی مبادم نیاز | |
| 810 | گزند تو پیدا گزند من ست | | دل درمند تو بند من ست | |
| | چُنین است و این نزد من شد درست | | همین بُد گمانی مرا از نُخُست | |
| | اگر باشد این نیست کاری شِگِفت | | کزان بر دل اندیشه باید گرفت | |
| | فریدون به سرو یمن گشت شاه | | جهانجوی دستان همین جست راه | |
| | که بی آتش از آب و از باد و خاک | | نشد تیره روی زَمین تابناک | |
| 815 | هر آنگه که بیگانه شد خویش تو | | شود تیره رای بداندیش تو | |
| | | | | |
| | سپرده به سیندخت مهراب گوش | | دلی پر ز کینه ، سری پر ز جوش | |
| | به سیندخت فرمود پس نامدار | | که رودابه را خیز پیش من آر | |
| | بترسید سیندخت از آن تیزمرد | | که او را ز درد اندرآرد به گَرد | |
| | بدو گفت : پیمانْت خواهم نُخُست | | که او را سپاری به من تندرست | |
| 820 | وُزان چون بهشت برین گلستان | | نگردد تهی روی کاولستان | |
| | یکی سخت پیمان سِتَد زو نُخُست | | به چاره دلش را ز کینه بشست | |
| | زبان داد سیندخت را نامجوی | | که رودابه را بد نیارد بروی | |
| | بدو گفت : بنگر که شاه زَمین | | سر از ما کُند زین سَخُن پر ز کین | |
| | نماند بر و بوم و نه مام و باب | | شود پست رودابه با رود آب | |
| 825 | چو بشنید سیندخت سر پیش اوی | | فرو برد و بر خاک بنهاد روی | |
| | بر دختر آمد پر از خنده لب | | گشاده رخ روزگون زیر شب | |
| | همی مژده دادش که جنگی پلنگ | | ز گور ژیان کرد کوتاه چنگ | |
| | کنون زود پیرایه بگشای و رو | | به پیش پدر رو بزاری بنو | |
| | بدو گفت رودابه : پیرایه چیست | | بجای سر ِمایه بی مایه کیست | |
| 830 | روان مرا پور سام ست جفت | | چرا آشکارا بباید نهفت | |
| | به پیش پدر شد چو خورشید شرق | | به یاقوت و زر اندرون گشته غرق | |
| | بهشتی بُد آراسته پر نگار | | چو خورشید تابان به خرّم بهار | |
| | پدر چون وُرا دید خیره بماند | | جهان آفرین را نهانی بخواند | |
| | بدو گفت کای شسته مغز از خرد | | ز پرگوهران این کی اندرخورد | |
| 835 | که با اَهرِمَن جفت گیرد پری | | که مه تاج بادت مه انگشتری | |
| | گر از دشت قحطان سگ مارگیر | | شود مغ ببایدش کشتن به تیر | |
| | سیه میژه بر نرگسان دژم | | فروخوابنید و نزد هیچ دم | |
| | پدر دل پر از خشم و سر پر ز جنگ | | همی رفت غرّان بسان پلنگ | |
| | سُوی خانه شد دختر دل شده | | رخان مُعَصفَر به زر آزده | |
| 840 | به یزدان گرفتند هر دو پناه | | هم این دلشده ماه و هم پیشگاه | |