| | به سام نریمان رسید آگهی | | از آن نامور پور با فرّهی | |
| | شبی از شبان داغ دل خفته بود | | ز کار زمانه برآشفته بود | |
| | چُنان دید کز کشور هندوان | | یکی مرد بر تازی اسپی دوان | |
| | [ فراز آمدی تا بنزدیک سام | | سُواری سرافراز و گرد و هُمام ] | |
| 95 | وُرا مژده دادی به فرزند اوی | | بران بُرز شاخ بَرومند اوی | |
| | چو بیدار شد موبدان را بخواند | | وُزین در سَخُن چندگونه براند | |
| | بدیشان بگفت آنچ در خواب دید | | جز آن هر چه از کاردانان شنید | |
| | چه گویید گفت اندرین داستان | | خردتان بدین هست همداستان | |
| | | | | |
| | هر آنکس که بودند پیر و جوان | | زبان برگشادند بر پهلَوان | |
| 100 | که بر سنگ و بر خاک شیر و پلنگ | | چه ماهی بدآب اندرون با نهنگ | |
| | همه بچّه را پروراننده اند | | ستایش به یزدان رساننده اند | |
| | تو پیمان نیکی دِهش بشکنی | | چُنان بی گنه بچّه را بفگنی | |
| | به یزدان کنون سوی پوزش گرای | | که اویست بر نیک و بد رهنمای | |
| | | | | |
| | چو شب تیره شد رای خواب آمدش | | کز اندیشه ی دل شتاب آمدش | |
| 105 | چُنان دید در خواب کز کوه هند | | دِرفشی برافراختندی بلند | |
| | غلامی پدید آمدی خوبروی | | سپاهی گران از پس ِپشتِ اوی | |
| | به دست چپش بر یکی موبدی | | سُوی راستش نامور بخردی | |
| | یکی پیش سام آمدی زان دو مرد | | گشادی زبان را به گفتار سرد | |
| | که ای مرد ناباکِ ناپاک رای | | دل و دیده شسته ز شرم خدای | |
| 110 | ترا دایه گر مرغ شایسته یی | | پس این پهلَوانی چه بایسته یی | |
| | گر آهوست بر مرد موی سپید | | ترا ریش و سر گشت چون خنگ بید | |
| | پس از آفریننده بیزار شو | | که در تَنْت هر روز رنگیست نو | |
| | پسر گر بنزد پدر بود خوار | | کنون هست پرورده ی کردگار | |
| | کزو مهربان تر بدو دایه نیست | | ترا خود به مهر اندرون مایه نیست | |
| | | | | |
| 115 | به خواب اندرون برخروشید سام | | چو شیر ژیان کاندر آید به دام | |
| | چو بیدار شد بخردان را بخواند | | سران سپه را همه برنشاند | |
| | بیامد دمان سوی آن کوهسار | | که افگندگان را کند خواستار | |
| | سر اندر ثریا یکی کوه دید | | که گفتی ستاره بخواهد کشید | |
| | نِشیمی ازو برکشیده بلند | | که ناید ز کیوان بروبر گزند | |
| 120 | فرو برده از شیز و صندل عمود | | یک اندر دگر بافته چوب عود | |
| | بدان سنگ خارا نگه کرد سام | | بدان هیبت مرغ و هول کنام | |
| | یکی کاخ بُد تارَک اندر سماک | | نه از رنج ِدست و نه از آب و خاک | |
| | ابر آفریننده کرد آفرین | | بمالید رخسارگان بر زَمین | |
| | کزانسان درو کوه و مرغ آفرید | | ز خارا سر اندر ثریا کشید | |
| 125 | بدانست کو دادگر داورست | | توانا و از برتران برتر است | |
| | ره برشدن جست و کی بود راه | | دد و دام را بر چُنان جایگاه | |
| | همی گفت کای برتر از جایگاه | | ز روشن گُمان و ز خورشید و ماه | |
| | گرین کودک از پاک پشت من ست | | نه از تخم بدگوهر آهَرمَن ست | |
| | از این بر شدن بنده را دست گیر | | مرین بی گنه را تو اندرپذیر | |
| | | | | |
| 130 | چُنین گفت سیمرغ با پور سام | | که ای دیده رنج نِشیم و کُنام | |
| | پدر سام یل پهلوان جهان | | سرافرازتر کس میان مِهان | |
| | بدین کوه فرزند جوی آمده ست | | ترا نزد او آب روی آمده ست | |
| | روا باشد اکنون که بردارمت | | بی آزار نزدیک او آرمت | |
| | | | | |
| | به سیمرغ بنگر که دستان چه گفت | | که سیر آمده ستی همانا زجفت | |
| 135 | نِشیم تو فرخنده گاه من ست | | دو پرّ تو فرّ کلاه من ست | |
| | | | | |
| | چُنین داد پاسخ که گر تاج و گاه | | ببینی و رسم کیانی کلاه | |
| | مگر کاین نِشیمت نیاید بکار | | یکی آزمایش کن از روزگار | |
| | ابا خویشتن بر یکی پرّ من | | همیشه همی باش در فرّ من | |
| | که در زیر پرّت بپرورده ام | | ابا بچّگانت برآورده ام | |
| 140 | گرت هیچ سختی بروی آورند | | گر از نیک و بد گفت وگوی آورند | |
| | بر آتش برافگن یکی پرّ من | | ببینی هم اندر زمان فرّ من | |
| | همانگه بیایم چو ابر سیاه | | بی آزارت آرم بدین جایگاه | |
| | | | | |
| | دلش کرد پدرام و برداشتش | | گرازان به ابر اندرافراشتش | |
| | ز پروازش آورد پیش پدر | | رسیده به زیر برش موی سر | |
| 145 | تنش پیلوار و دو رخ چون بهار | | پدر چون بدیدش بنالید زار | |
| | فرو برد سر پیش سیمرغ زود | | نیایش همی بافرین برفزود | |
| | سراپای کودک همه بنگرید | | همی تاج و تخت کیی را سَزید | |
| | بر و بازوی شیر و خورشید روی | | دل پهلوان ، دست شمشیر جوی | |
| | سیاهش مژه دیده ها قیرگون | | چو بُسّد لب و رخ همانند خون | |
| 150 | دل سام شد چون بهشت برین | | بران پاک فرزند کرد آفرین | |
| | تنش را یکی پهلوانی قبای | | بپوشید و ز ِکوه بگزارد پای | |
| | فرود آمد از کوه و بالای خواست | | همان جامه ی خسروآرای خواست | |
| | سپه یکسره پیش سام آمدند | | گشاده دل و شادکام آمدند | |
| | تبیره زنان پیش بردند پیل | | برآمد یکی گرد چون کوه نیل | |
| 155 | خروشیدن کوس با کرّهَ نای | | همان زنگ زرّین و هندی درای | |
| | سُواران همه نعره برداشتند | | بدان خرّمی راه بگذاشتند | |
| | به شادی به شهر اندرون آمدند | | ابا پهلوانی فزون آمدند | |
| | یکایک به شاه آمد این آگهی | | که سام آمد از کوه با فرّهی | |
| | بدان آگهی شد منوچهر شاد | | بسی از جهان آفرین کرد یاد | |
| | | | | |
| 160 | بفرمود تا نوذر نامدار | | شود تازنان پیش سام سُوار | |
| | کند آفرین کَیانی بروی | | بدان شادمانی که بگشاد روی | |
| | بفرمایدش تا سُوی شهریار | | شود تا سَخُنها کند خواستار | |
| | ببیند یکی روی دستان سام | | که بُد پرورانیده اندر کُنام | |
| | وُزانجا سُوی زاولستان شود | | بر آیین خسروپرستان شود | |
| | | | | |
| 165 | چو نوذر بر سام نیرم رسید | | که پور جهان پهلوان را بدید | |
| | فرود آمد از اسپ سام سُوار | | گرفتند مر یکدیگر را کنار | |
| | ز شاه و ز گردان بپرسید سام | | وُزیشان بدو داد نوذر پَیام | |
| | چو بشنید پیغام شاه بزرگ | | زمین را ببوسید سام سُتُرگ | |
| | دمان سوی درگاه بنهاد روی | | چُنان که ش بفرمود دیهیم جوی | |
| | | | | |
| 170 | چُن آمد بنزدیکی شهر ِشاه | | سپهبد پذیره شدش با سپاه | |
| | دِرفش منوچهر چون دید سام | | پیاده شد از اسپ و بگذارد گام | |
| | منوچهر فرمود تا برنشست | | مرآن پاک دل مرد خسرو پرست | |
| | سُوی تخت ایران نهادند روی | | چه دیهیم دار و چه دیهیم جوی | |
| | منوچهر برگاه بنشست شاد | | کلاه بزرگی به سر برنهاد | |
| 175 | به یک دست قارن به یک دست سام | | نشستند روشن دل و شادکام | |
| | پس آراسته زال را پیش شاه | | به زرّین عَمود و به زرّین کلاه | |
| | گُرازان بیاورد سالار بار | | شِگفتی بماند اندرو شهریار | |
| | بدان بُرز بالا و آن خوب چهر | | تو گفتی که آرام جان ست و مهر | |
| | چُنین گفت مر سام را شهریار | | که از من تو این را به زنهار دار | |
| 180 | به خیره میازارش از هیچ روی | | به کس شادمانه مشو جز بدوی | |
| | که فرّ کَیان دارد و چنگ شیر | | دل هوشمندان و آهنگ شیر | |
| | | | | |
| | پس از کار سیمرغ و کوه بلند | | وُزان تا چرا خوارگشت ارجمند | |
| | یکایک همه سام با او بگفت | | ز خورد و ز جای و ز خفت و نهفت | |
| | وُ زافگندن زال بگشاد راز | | که چون گشت بر سر سپهر از فراز | |
| 185 | سرانجام گیتی ز سیمرغ و زال | | پر از داستان شد به بسیار سال | |
| | | | | |
| | بفرمود پس شاه تا موبدان | | ستاره شناسان و هم بخردان | |
| | بجویند تا اختر زال چیست | | بران اختر از بخت سالار کیست | |
| | چو گیرد بلندی چه خواهد بُدن | | همان داستان از چه خواهد زدن | |
| | ستاره شناسان هم اندر زمان | | از اختر گرفتند یک یک نشان | |
| 190 | بگفتند با شاه دیهیم دار | | که شادان بزی تا بود روزگار | |
| | که او پهلوانی بود نامدار | | سرافراز و هشیار و گرد و سوار | |
| | چو بشنید شاه این سَخُن شاد شد | | دل پهلوان از غم آزاد شد | |
| | یکی خلعتی ساخت شاه زَمین | | که کردند هر کس برو آفرین | |
| | ز اسپان تازی به زرّین ستام | | ز شمشیر هندی به زرّین نیام | |
| 195 | ز دیبا و خزّ و ز یاقوت و زر | | ز گستردنی های بسیار مر | |
| | غلامان رومی به دیبای روم | | همه پیکر از گوهر و زرّ بوم | |
| | زَبرجد طبق ها و پیروزه جام | | چه از زرّ سرخ و چه از سیم خام | |
| | پر از مشک و کافور و پر زعفران | | همه پیش بردند فرمانبران | |
| | همان جوشن و ترگ و برگُستَوان | | همان نیزه و تیر و گرز و گران | |
| 200 | همان تخت پیروزه و تاج زر | | همان مُهر یاقوت و زرّین کمر | |
| | به مُهر منوچهری عهدی نبشت | | سراسر ستایش بسان بهشت | |
| | همه کاول و دنبر و مای و هند | | ز دریای چین تا به دریای سند | |
| | ز زاولستان تا بدان روی بُست | | به نوّی نبشتند عهدی درست | |
| | چو این عهد و خلعت بیاراستند | | پس اسپ جهان پهلوان خواستند | |
| 205 | چو این کرده شد سام بر پای خاست | | که ای مهربان مهتر داد و راست | |
| | ز ماهی بر اندیشه تا چرخ ماه | | چو تو شاه ننهاد بر سر کلاه | |
| | به مهر و به داد و به خوی و خرد | | زمانه همی از تو رامش برد | |
| | همه گنج گیتی به چشم تو خوار | | مبادا ز تو نام تو یادگار | |
| | فرود آمد و تخت را داد بوس | | ببستند بر کوهه ی پیل کوس | |
| 210 | سُوی زاولستان نهادند روی | | نِظاره بریشان همه شهر و کوی | |
| | چو آمد به نزدیکی نیمروز | | خبر شد ز سالار گیتی فروز | |
| | بیاراستند سیستان چون بهشت | | گِلش مشک سارا بُد و زرّ خشت | |
| | به سر مشک و دینار برریختند | | بسی زعفران و درم بیختند | |
| | یکی شادمانی بُد اندر جهان | | سراسر میان کِهان و مِهان | |
| 215 | هر آنجا که بُد مهتری نامجوی | | ز گیتی سُوی سام بنهاد روی | |
| | که فرخنده بادا پی این جوان | | برین پاک دل نامور پهلوان | |
| | چو بر پهلوان آفرین خواندند | | ابر زال بر زر برافشاندند | |
| | نشست آنگهی سام با رود و جام | | همی داد چیز و همی راند کام | |
| | کسی کو به خلعت سَزاوار بود | | خردمند بود و جهاندار بود | |
| 220 | براندازه شان خلعت آراستند | | همی پایه ی برتری خواستند | |
| | جهان دیدگان را ز کشور بخواند | | سَخُن های بایسته چندی براند | |
| | چُنین گفت با نامور بخردان | | که ای پاک و هشیار دل موبدان | |
| | چُنین ست فرمان هشیار شاه | | که لَشکر همی راند باید به راه | |
| | سُوی گرگساران و مازندران | | همی راند خواهم سپاهی گران | |
| 225 | دل و جانم ایدر بماند همی | | مژه خون دل برفشاند همی | |
| | به گاه جوانی و کُندآوری | | یکی ساختم بیهده داوری | |
| | پسر داد یزدان بیانداختم | | ز بی دانشی ارج نشناختم | |
| | گرانمایه سیمرغ برداشتش | | همان آفریننده بگماشتش | |
| | بپرورد تا شد چو سرو بلند | | مرا خوار بُد ، مرغ را ارجمند | |
| 230 | چو هنگام بخشایش آمد فراز | | جهاندار یزدان به من داد باز | |
| | بدانید کین زینهار من ست | | بنزد شما یادگار من ست | |
| | گرامیش دارید و پندش دهید | | همه راه و رای بلندش دهید | |
| | | | | |
| | سُوی زال کرد آنگهی سام روی | | که داد و دِهش گیر و آرام جوی | |
| | چُنان دان که زابلستان خان تُست | | جهان سر بسر زیر فرمان تُست | |
| 235 | ترا خان و مان باید آبادتر | | دل دوستداران به تو شادتر | |
| | کلید در گنج ها پیش تُست | | دلم شاد و غمگین به کم بیش تُست | |
| | به سام آنگهی گفت زال جوان | | که چون زیست خواهم من ایدر نوان | |
| | جدا پیشتر زین کجا داشتی | | مدارم گر آمد گه آشتی | |
| | کسی با گنه گر ز مادر بزاد | | من آنم ، سَزد گر بمانم ز داد | |
| 240 | گهی زیر چنگال مرغ اندرون | | چمیدن به خاک و مزیدن ز خون | |
| | کنون دور ماندم ز پروردگار | | چُنین پروراند همی روزگار | |
| | ز گل بهره ی من بجز خار نیست | | بدین با جهاندار پیگار نیست | |
| | | | | |
| | پدر گفت : پرداختن دل سَزاست | | بپرداز و برگوی هرچت هواست | |
| | ستاره شُمر مرد اخترگرای | | چُنین زد ترا زاختر نیک ، رای | |
| 245 | که ایدر ترا باشد آرامگاه | | هم ایدر سپاه و هم ایدر کلاه | |
| | گذر نیست بر حکم گردان سپهر | | هم ایدر بگسترد بایدت مهر | |
| | کنون گرد خویش اندرآور گروه | | سُواران و مردان دانش پژوه | |
| | بیاموز و بشنو ز هر دانشی | | بیابی ز هر دانشی رامشی | |
| | ز خورد و ز بخشش میاسای هیچ | | همه دانش و داد دادن بسیچ | |
| 250 | بگفت این و برخاست آوای کوس | | هوا قیرگون شد زَمین آبنوس | |
| | خروشیدن زنگ و هندی درای | | برآمد ز دهلیز پرده سرای | |
| | سپهبد سُوی جنگ بنهاد روی | | یکی لَشکری ساخته جنگجوی | |
| | بشد زال با او دو منزل براه | | بدان تا پدر چون گذارد سپاه | |
| | پدر زال را تنگ در بر گرفت | | شِگفتی خروشیدن اندرگرفت | |
| 255 | بفرمود تا بازگردد ز راه | | شود شاد دل باز ِتخت و کلاه | |
| | بیامد پر اندیشه دستان سام | | که تا چون زید تا بود نیک نام | |
| | نشست از بر نامور تخت عاج | | به سر بر نهاد آن فروزنده تاج | |
| | ابا یاره و گرزه ی گاو سر | | ابا طوق زرّین و زرّین کمر | |
| | ز هر کشوری موبدی را بخواند | | پژوهید هر چیز و هر چیز راند | |
| 260 | ستاره شناسان و دین آوران | | سُواران و گردان و کین آوران | |
| | شب و روز بودند با او بهم | | زدندی همی رای بر بیش و کم | |
| | چُنان گشت زال از بس آموختن | | که گفتی ستاره ست از افروختن | |
| | به رای و به دانش به جایی رسید | | که چون خویشتن در جهان کس ندید | |
| | چُنین هم همی گشت گردان سپهر | | ابر سام و بر زال گسترد مهر | |
| | | | | |
| 265 | چُنان بُد که روزی چُنین کرد رای | | که در پادشاهی بجنبد ز جای | |
| | برون رفت با ویژه گردان خویش | | که با او یکی بودشان رای و کیش | |
| | سُوی کشور هندوان کرد رای | | سوی کاول و دنبر و مرغ و مای | |
| | بهر جای کاخی بیاراستی | | می و رود و رامشگران خواستی | |
| | گشاده در گنج و افگنده رنج | | بر آیین و رسم سرای سپنج | |
| 270 | ز زاول به کاول رسید آن زمان | | گرازان و خندان و دل شادمان | |
| | | | | |
| | یکی پادشا بود مهراب نام | | زبردست و با گنج و گسترده کام | |
| | به بالا به کردار آزاد سرو | | به رخ چون بهار و به رفتن تذرو | |
| | دل بخردان داشت و مغز ردان | | دو کتف یلان و هُش موبدان | |
| | چو آگه شد از کار دستان سام | | ز کاول بیامد به هنگام بام | |
| 275 | ابا گنج و اسپان آراسته | | غلامان و هر گونه یی خواسته | |
| | ز دینار و یاقوت و مشک و عبیر | | ز دیبای زربَفت و خزّ و حریر | |
| | یکی تاج پر گوهر شاهوار | | یکی طوق زرّین زَبرجد نگار | |
| | | | | |
| | چو آمد به دستان سام آگهی | | که زیبا مهی آمد اندر بهی | |
| | پذیره شدش زال و بنواختش | | به آیین یکی پایگه ساختش | |
| 280 | سُوی تخت پیروزه بازآمدند | | گشاده دل و بزم ساز آمدند | |
| | یکی پهلَوانی نِهادند خوان | | نشستند بر خوان دو فرّخ سران | |
| | گسارنده ی می می آورد و جام | | نگه کرد مهراب را پور سام | |
| | خوش آمد هماناش دیدار اوی | | دلش تیز تر گشت در کار اوی | |
| | چو مهراب برخاست از خوان زال | | نگه کرد زال اندر آن برز و یال | |
| 285 | چُنین گفت با مهتران زال زر | | که زیبنده تر زین که بندد کمر | |
| | یکی نامدار از میان مِهان | | چُنین گفت با پهلَوان جهان | |
| | پس پرده ی او یکی دخترست | | که رویش زخورشید نیکو ترست | |
| | ز سر تا به پایش بکردار عاج | | به رخ چون بهشت و به بالای ساج | |
| | بران سُفت سیمنْش مشکین کمند | | سرش گشته چون حلقه ی پای وند | |
| 290 | رخانش چو گلنار و لب ناردان | | ز سیمین برش رُسته دو نار دان ! | |
| | دو چشمش بسان دو نرگس به باغ | | مژه تیرگی برده از پرّ زاغ | |
| | دو ابرو بسان کمان طراز | | برو توز پوشیده از مشک و ناز | |
| | بهشتست سرتاسر آراسته | | پر آرایش و دانش و خواسته | |
| | | | | |
| | برآورد مر زال را دل به جوش | | چُنان شد کزو رفت آرام و هوش | |
| 295 | شب آمد پر اندیشه بنشست زال | | به نادیده برگشت بی خورد و هال | |
| | | | | |
| | چو زد بر سر کوه بر تیغ شید | | چو یاقوت شد روی گیتی سپید | |
| | در بار بگشاد دستان سام | | برفتند گردان زرّین ستام | |
| | در پهلوان را بیاراستند | | چو بالای پرمایگان خواستند | |
| | برون رفت مهراب کاول خدای | | سُوی خانه ی زال زاول خدای | |
| 300 | چو آمد بنزدیکی بارگاه | | خروش آمد از در که بگشای راه | |
| | بر ِپهلوان اندرون رفت گَوْ | | بسان درختی پر از بار نَوْ | |
| | دل زال شد شاد و بنواختش | | وُزان انجمن سر برافراختش | |
| | بپرسید کز من چه خواهی بخواه | | ز تخت و ز مُهر و ز تیغ و کلاه | |
| | بدو گفت مهراب کای پادشا | | سرافراز و پیروز و فرمان روا | |
| 305 | مرا آرزو در زمانه یکیست | | که آن آرزو بر تو دشخوار نیست | |
| | که آیی به شادی سُوی خان من | | چو خورشید روشن کنی جان من | |
| | چُنین داد پاسخ که این رای نیست | | به خان تو اندر مرا جای نیست | |
| | نباشد بدین سام همداستان | | همان شاه چون بشنود داستان | |
| | که ما می گساریم و مستان شویم | | سوی خانه ی بت پرستان شویم | |
| 310 | جزین هرچه گویی تو پاسخ دهم | | به دیدار تو رای فرّخ نهم | |
| | چو بشنید مهراب کرد آفرین | | به دل زال را خواند ناپاک دین | |
| | خرامان برفت از بر ِتخت اوی | | همی آفرین خواند بر بخت اوی | |
| | چو دستان سام از پسش بنگرید | | ستودش فراوان چُنان چون سَزید | |
| | ازان کو نه هم دین و هم راه بود | | زبان از ستودنْش کوتاه بود | |
| 315 | برو هیچ کس چشم نگماشتند | | مر او را ز دیوانگان داشتند | |
| | چو روشن دل پهلوان را بدوی | | چُنان گرم دیدند و با گفت و گوی | |
| | مرو را ستودند یک یک مِهان | | همان کز پس پرده بودش نِهان | |
| | ز بالا و دیدار و آهستگی | | ز بایستگی ، هم ز شایستگی | |
| | دل زال یکباره دیوانه گشت | | خرد دور شد عشق فرزانه گشت | |
| 320 | سپهدار تازی سر ِراستان | | برین بر بگوید یکی داستان | |
| | که تا زنده ام چرمه جَفت من ست | | خم چرخ گردان نهفت من ست | |
| | عروسم نباید که رعنا شوم | | بنزد خردمند کانا شوم | |
| | از اندیشگان زال شد خسته دل | | بران کار بنهاد پیوسته دل | |
| | همی بود پیچان دل از گفت وگوی | | مگر تیره گرددْش ازین آب روی | |
| 325 | همی گشت یکچند بر سر سپهر | | دل زال زر تا سر آگنده مهر | |
| | | | | |
| | چُنان بُد که مهراب روزی پگاه | | برفت و بیامد ازآن بارگاه | |
| | گذر کرد سوی شبستان خویش | | همی گشت بر گردِ بستان خویش | |
| | دو خورشید بود اندر ایوان اوی | | چو سیندخت و رودابه ی ماه روی | |
| | بیاراسته همچو باغ بهار | | سراپای پر بوی و رنگ و نگار | |
| 330 | شِگفتی به رودابه اندر بماند | | همی نام یزدان بروبر بخواند | |
| | یکی سرو دید از برش گِرد ماه | | نهاده به مه بر ز عنبر کلاه | |
| | به دیبا و گوهر بیاراسته | | بسان بهشتی پر از خواسته | |
| | بپرسید سیندخت مهراب را | | ز خوشاب بگشاد عنّاب را | |
| | که چون رفتی امروز و چون آمدی | | که کوتاه باد از تو دست بدی | |
| 335 | چه مردی ست این پیرسر پور سام ؟ | | همی تخت کام آیدش گر کُنام | |
| | خوی مردمی هیچ دارد همی ؟ | | پی نامداران سپارد همی ؟ | |
| | چُنین داد مهراب پاسخ بدوی | | که ای سرو سیمین بر خوب روی | |
| | به گیتی در از پهلوانان گُرد | | پی زال زر کس نیارد سپُرد | |
| | چو دست و عِنانش بر ایوان نگار | | نبینی و بر زین چنو یک سُوار | |
| 340 | دل شیر نر دارد و زور پیل | | دو دستش بکردار دریای نیل | |
| | چو بر گاه باشد دُر افشان بود | | چو در جنگ باشد سرافشان بود | |
| | رخش پژمراننده ی ارغوان | | جوان سال و بیدار و دولت جوان | |
| | به کین اندرون چون نهنگ بلاست | | به زین اندرون تیز چنگ اَژدَهاست | |
| | نشاننده ی خاک در کین به خون | | فشاننده ی خنجر آبگون | |
| 345 | از آهو همان که ش سپیدست موی | | نگوید سَخُن مردم عیب جوی | |
| | | | | |
| | چو بشنید رودابه آن گفت و گوی | | برافروخت و گلنارگون کرد روی | |
| | دلش گشت پرآتش از مهر زال | | ازو دور شد رامش و خورد و هال | |
| | چو بگرفت جای خردْش آرزوی | | دگر شد به رای و به آیین و خوی | |
| | | | | |
| | وُرا پنج ترک پرستنده بود | | پرستنده و مهربان بنده بود | |
| 350 | بدان بندگان خردمند گفت | | که بگشاد خواهم نِهان از نِهفت | |
| | شما یک به یک رازدار منید | | پرستنده و غمگسار منید | |
| | بدانید هر پنج و آگه بید | | همه ساله با بخت همراه بید | |
| | که من عاشقی ام چو بحر دمان | | ازو بر شده موج تا آسمان | |
| | پر از پور سام ست روشن دلم | | به خواب اندر اندیشه زو نگسلم | |
| 355 | همه خانه ی شرم پر مهر اوست | | شب و روزم اندیشه ی چهر اوست | |
| | کنون این سَخُن را چه درمان کنید | | چه خواهید و با من چه پیمان کنید | |
| | یکی چاره باید کنون ساختن | | دل و جانم از رنج پرداختن | |
| | | | | |
| | پرستندگان را شِگفت آمد آن | | که بی کاری آمد ز دخت ردان | |
| | همه پاسخش را بیاراستند | | چن آهَرمَن از جای برخاستند | |
| 360 | که ای افسر بانوان جهان | | سرافرازتر دختر اندر مِهان | |
| | ستوده ز هندوستان تا به چین | | میان بتستان چو روشن نگین | |
| | به بالای تو بر چمن سرو نیست | | چو رخسار تو تابش پرو نیست | |
| | نگار رخ تو ز قَنّوج ، رای | | فرستد همی سوی خاورخدای | |
| | ترا خود بدیده درون شرم نیست | | پدر را بنزد تو آزرم نیست | |
| 365 | که آنرا که اندازد از بر پدر | | تو خواهی که گیری مرو را به بر | |
| | که پرورده ی مرغ باشد به کوه | | نشانی شده در میان گروه | |
| | کس از مادران پیر هرگز نزاد | | نه زان کس که زاید بیاید نژاد | |
| | چُنین سرخ دو بُـّسَد شیربوی | | شِگفتی بود گر بود پیرجوی | |
| | جهانی سراسر پر از مهر تُست | | به ایوان ها صورت چهر تُست | |
| 370 | ترا با چُنین روی و بالای و موی | | ز چرخ چهارم خود آیدْت شوی | |
| | | | | |
| | چو رودابه گفتار ایشان شنید | | چُن از باد آتش ، دلش بردمید | |
| | بریشان یکی بانگ برزد به خشم | | بتابید روی و بخوابید چشم | |
| | وُزان پس به خشم و به روی دژم | | به ابرو ز خشم اندرآورد خم | |
| | چُنین گفت کین خام گفتارتان | | شنیدن نه ارزد پیگارتان | |
| 375 | نه فغفور خواهم نه قیصر نه چین | | نه از تاجداران ایران زَمین | |
| | به بالای من پور سام ست زال | | ابا بازوی شیر و با بُرز و یال | |
| | گرش پیرخوانی همی یا جوان | | مرا او بجای تن ست و روان | |
| | پرستنده آگه شد از راز اوی | | چو بشنید دل خسته آواز اوی | |
| | به آواز گفتند ما بنده ییم | | به دل مهربان و پرستنده ییم | |
| 380 | نگه کن کنون تا چه فرمان دِهی | | نیاید ز فرمان تو جز بهی | |
| | چو ما صدهزاران فدای تو باد | | خرد زآفرینش ردای تو باد | |
| | سیه نرگسانت پر از شرم باد | | رخانت پر از رنگ و آزرم باد | |
| | اگر جادویی باید آموختن | | به بند و فسون چشم ها دوختن | |
| | بپرّیم با مرغ و آهو شویم | | بپوییم و در چاره جادو شویم | |
| 385 | مگر شاه را نزد ماه آوریم | | بنزدیک او پایگاه آوریم | |
| | لب سرخ ، رودابه پرخنده کرد | | رخان مُعَصفَر سوی بنده کرد | |
| | که این گفته را گر شوی کاربند | | درخت بَرومند کاری بلند | |
| | که هر روز یاقوت بار آورد | | برش تازنان در کنار آورد | |
| | | | | |
| | پرستنده برخاست از پیش اوی | | سُوی چاره بیچاره بنهاد روی | |
| 390 | به دیبای رومی بیاراستند | | سر زلف بر گل بپیراستند | |
| | برفتند هر پنج تا رودبار | | ز هر بوی و رنگی چو خرّم بهار | |
| | مه فوردین و سر سال بود | | لب رود لشکرگه زال بود | |
| | همی گل چِدند از لب رودبار | | رخان چون گلستان و گل در کنار | |
| | نگه کرد دستان ز تخت بلند | | بپرسید کین گل پرستان که اند | |
| 395 | چُنین گفت گوینده با پهلوان | | که از کاخ مهراب سرو روان | |
| | پرستندگان را سُوی گلستان | | فرستد همی ماه کاولستان | |
| | بنزد پریچهرگان رفت زال | | کمان خواست از ترک و بفراخت یال | |
| | پیاده همی شد ز بهر شکار | | خَشَنسار بُد اندر آن رودبار | |
| | کمان ترکِ گل رخ به زه برنهاد | | به دست جهان پهلوان درنهاد | |
| 400 | نگه کرد تا مرغ برخاست زاب | | یکی تیره بنداخت اندر شتاب | |
| | ز پروازش آورد گردان فرود | | چکان خون و وَشّی شده آب رود | |
| | پرستنده با ریدک پهلوان | | سَخُن گفت و بگشاد شیرین زبان | |
| | که این شیربازو گَو پیلتن | | چه مردست و شاه کدام انجمن | |
| | که بگشاد ازین گونه تیر از کمان | | چه سنجد به پیش اندرش بدگُمان | |
| 405 | ندیدیم زیبنده تر زین سُوار | | به تیر و کمان بر چُنین کامگار | |
| | پری روی دندان به لب برنهاد | | مکن گفت ازین گونه از شاه یاد | |
| | شه نیمروزست فرزند سام | | که دستانْش خوانند شاهان به نام | |
| | نگردد فلک بر چنو یک سوار | | زمانه نبیند چنو نامدار | |
| | پرستنده با کودک ماه روی | | بخندید و گفتش که چندین مگوی | |
| 410 | که ماهی ست مهراب را در سرای | | به یک سر ز شاه تو برتر به پای | |
| | به بالای ساج ست و هم رنگ عاج | | یکی ایزدی بر سر از مشک تاج | |
| | دو نرگس دُژمّ و دو ابرو به خم | | ستون دو ابرو چو سیمین قلم | |
| | دهانش به تنگی دل مستمند | | سر زلف چون حلقه ی پای وند | |
| 413+ | دو جادوش پر خواب و پرآب روی | | پر از لاله رخسار و پر مشک موی | |
| | نفس را مگر بر لبش راه نیست | | چنو در جهان نیز یک ماه نیست | |
| 415 | بدین چاره تا آن لب لعل فام | | کند آشنا با لب پور سام | |
| | [ چُنین گفت با بندگان خوبچهر | | که با ماه خوب ست رخشنده مهر ] | |
| | [ ولیکن به گفتن مرا روی نیست | | بود کاب را ره بدین جوی نیست ] | |
| | [ دلاور که پرهیز جوید ز جفت | | بماند بسانی اندر نهفت ] | |
| | [ بدان تاش دختر نباشد ز بُن | | نباید شنیدنْش ننگی سَخُن ] | |
| 420 | [ چُنین گفت مر جفت را باز نر | | چو بر خایه بنشست و گسترد پر ] | |
| | [ کزین خایه گر مایه بیرون کنیم | | ز پشت پدر خایه بیرون کنیم ] | |
| | | | | |
| | ازیشان چو برگشت خندان غلام | | بپرسید ازو نامور پور سام | |
| | که با تو چه گفت آنک خندان شدی | | شکفته رخ و سیم دندان شدی | |
| | بگفت آنچ بشنید با پهلوان | | ز شادی دل پهلوان شد جوان | |
| 425 | چُنین گفت با ریدک ماه روی | | که رو مر پرستندگان را بگوی | |
| | که از گلستان یک زمان مگذرید | | مگر با گل از باغ گوهر برید | |
| | درم خواست و دینار و گوهر ز گنج | | گرانمایه دیبای زربَفت پنج | |
| | بفرمود کین نزد ایشان برید | | کسی را مگویید و پنهان برید | |
| | نباید شدنشان سوی کاخ باز | | بدان تا پَیامی فرستم براز | |
| 430 | برفتند با ماه رخسار پنج | | ابا گرم گفتار و دینار و گنج | |
| | بدیشان سپردند گنجی گهر | | پَیام جهان پهلوان زال زر | |
| | پرستنده با ماه دیدار گفت | | که هرگز نماند سَخُن در نهفت | |
| | مگر آنک باشد میان دو تن | | سه تن نانهان ست و چار انجمن | |
| | بگوی ای خردمند پاکیزه رای | | سخن گر به رازست با ما سرای | |
| | | | | |
| 435 | پرستنده گفتند یک با دگر | | که آمد به دام اندرون شیر نر | |
| | کنون کار رودابه و کام زال | | بجای آید و این بود خوب فال | |
| | | | | |
| | بیامد سیه چشم گنجور شاه | | که بود اندران کار دستور شاه | |
| | سَخُن هر چه بشنید از آن دلنواز | | همی گفت پیش سپهبد براز | |
| | سپهبد خرامید تا گلستان | | به اومید خورشید کاولستان | |
| 440 | پری روی گلرخ بتان طراز | | برفتند و بردند پیشش نماز | |
| | سپهبد بپرسید ازیشان سَخُن | | ز بالا و دیدار آن سرو بُن | |
| | ز گفتار و دیدار و رای و خرد | | بدان تا به خوی وی اندرخورد | |
| | بگویید با من یکایک سَخُن | | به کژّی نگر نفگنید ایچ بن | |
| | اگر راستی تان بود گفت وگوی | | بنزدیک من تان بود آبروی | |
| 445 | وُگر هیچ کژّی گمانی برم | | به زیر پی پیلتان بسپَرم | |
| | رخ لاله رخ گشت چون سندروس | | به پیش سپهبد زمین داد بوس | |
| | چُنین گفت کز مادر اندر جهان | | نزاید کسی در میان مِهان | |
| | به دیدار سام و به بالای اوی | | به پاکی دل و دانش و رای اوی | |
| | دگر چون تو ای پهلوان دلیر | | بدین برز بالا و بازوی شیر | |
| 450 | همی می چکد گویی از روی تو | | عبیرست گویی مگر موی تو | |
| | سدیگر چو رودابه ی ماه روی | | یکی سرو سیم ست با رنگ و بوی | |
| | ز سر تا به پایش گل ست و سمن | | به سرو سهی بر ، سهیل یمن | |
| | از آن گنبد سیم سر بر زَمین | | فرو هشته برگِل کمند کمین | |
| | به مشک و به عنبر سرش تافته | | به یاقوت و زُمْرُد بنش بافته | |
| 455 | سر زلف و جعدش چو مشکین زره | | فگنده ست گویی گره بر گره | |
| | ده انگشت بر سان سیمین قلم | | برو کرده از غالیه صد رقم | |
| | بت آرای چون او نبیند به چین | | برو ماه و پروین کند آفرین | |
| | سپهبد پرستنده را گفت گرم | | سَخُن های شیرین به آوای نرم | |
| | که اکنون چه چاره ست با من بگوی | | یکی راه جستن بنزدیک اوی | |
| 460 | که ما را دل و جان پر از مهر اوست | | همه آرزو دیدن چهر اوست | |
| | پرستنده گفتا چه فرمان دهی | | گزاریم تا کاخ سرو سهی | |
| | ز فرخنده رای جهان پهلَوان | | ز دیدار و گفتار روشن روان | |
| | فریبیم و گوییم هر گونه یی | | میان اندرون نیست وارونه یی | |
| | سر مشک بویش به دام آوریم | | لبش زی لب پور سام آوریم | |
| 465 | خِرامد مگر پهلوان با کمند | | بنزدیک دیوار ِکاخ ِبلند | |
| | کند حلقه در گردن کنگره | | شود شیر شاد از شکار بره | |
| | | | | |
| | برفتند خوبان و برگشت زال | | شبی دیریاز آن به بالای سال | |
| | | | | |
| | رسیدند خوبان به درگاه کاخ | | به دست اندرون هر یک از گل دو شاخ | |
| | نگه کرد دربان برآراست جنگ | | زبان کرد گستاخ و دل کرد تنگ | |
| 470 | که بیگه ز درگاه بیرون شوید | | شِگِفت آیدم تا شما چون شوید | |
| | بتان پاسخش را بیاراستند | | به تنگی دل از جای برخاستند | |
| | که امروز روزی دگرگونه نیست | | به راه گُلان دیو ِوارونه نیست | |
| | بهار آمد از گلستان گل چنیم | | ز روی زَمین شاخ سنبل چنیم | |
| | نگهبان در گفت کامروز کار | | نباید گرفتن بدان هم شمار | |
| 475 | که زال سپهبد به کاول نبود | | سراپرده ی شاه زاول نبود | |
| | نبینید کز کاخ ، کاول خدای | | به زین اندرآورد شبگیر پای | |
| | اگرتان ببیند چُنین گل بدست | | کند بر زَمین تان همانگاه پست | |
| | | | | |
| | شدند اندر ایوان بتان طراز | | نشستند با ماه و گفتند راز | |
| | نِهادند دیبا و گوهر به پیش | | بپرسید رودابه از کمّ و بیش | |
| 480 | که چون بودتان کار با پور سام ؟ | | به دیدن بهست ار به آواز و نام | |
| | پری چهره هر پنج بشتافتند | | چو با ماه جای سَخُن یافتند | |
| | که مردی ست برسان سرو سهی | | همش زیب و هم فرّ شاهنشهی | |
| | همش رنگ و بوی و همش قدّ و شاخ | | سُواری میان لاغر و بر فراخ | |
| | دو چشمش چو دو نرگس قیرگون | | لبانش چو بُـّسَد رخانش چو خون | |
| 485 | کف و ساعدش چو کف شیر نر | | هیون ران و موبددل و شاه فر | |
| | سراسر سپیدست مویش به رنگ | | از آهو همین است و این نیست ننگ | |
| | سر جعد آن پهلَوان جهان | | چو سیمین زره بر گل ِارغوان | |
| | که گویی همی خود چُنان بایدی | | وُگر نیستی مهر نفزایدی | |
| | به دیار تو داده ییمش نُوید | | ز ما بازگشته ست دل پر امید | |
| 490 | کنون چاره ی کار مهمان بساز | | بفرمای تا بر چه گردیم باز | |
| | چُنین گفت با بندگان سروبُن | | که دیگر شده ستی به رای و سَخُن | |
| | همان زال کو مرغ پرورده بود | | چُنان پیرسر بود و پژمرده بود | |
| | به دیدار شد چون گل ارغوان | | سهی قدّ و دیبا رخ و پهلوان | |
| | رخ من به پیشش بیاراستید | | به گفتار و زان پس بها خواستید | |
| 495 | همی گفت و یک لب پراز خنده داشت | | رخان هم چو گلنار آگنده داشت | |
| | پرستنده با بانوی ماه روی | | چُنین گفت کاکنون ره چاره جوی | |
| | که یزدان هرآنچت هوا بود داد | | سرانجام این کار فرخنده باد | |
| | یکی خانه بودش چو خرّم بهار | | ز چهر بزرگان بروبر نگار | |
| | به دیبای چینی بیاراستند | | طبق های زرّین بپیراستند | |
| 500 | عقیق و زبرجد برو ریختند | | می و مشک و عنبر برآمیختند | |
| | بنفشه گل و نرگس و ارغوان | | سمن شاخ و سنبل به دیگر کران | |
| | همه زرّ و پیروزه بُد جامشان | | به روشن گلاب اندر آرامشان | |
| | از آن خانه ی دخت خورشیدروی | | برآمد همی تا به خورشید بوی | |
| | | | | |
| | چو خورشید تابنده شد ناپدید | | در حجره بستند و گم شد کَلید | |
| 505 | پرستنده شد سوی دستان سام | | که شد ساخته کار بگذار گام | |
| | سپهبد سُوی کاخ بنهاد روی | | چُنان چون بود مردم جفت جوی | |
| | برآمد سیه چشم گلرخ به بام | | چو سرو سهی بر سرش ماه تام | |
| | چُن از دور دستان ِسام ِسُوار | | بدید ، آمد آن دختر نامدار | |
| | دو بیجاده بگشاد و آواز داد | | که شاد آمدی ای جوانمرد و راد | |
| 510 | درود جهان آفرین بر تو باد | | خم چرخ گردان زمین تو باد | (!) |
| | پرستنده خرّم دل و شاد باد | | چنانی سراپای کو کرد یاد | |
| | | | | |
| | پیاده بدین سان ز پرده سرای | | برنجیدت این خسروانی دو پای | |
| | سپهبد کزان گونه آوا شنید | | نگه کرد خورشیدرخ را بدید | |
| | شده بام از آن گوهر تابناک | | بجای گِلش ، سرخ یاقوت ، خاک | |
| 515 | چُنین داد پاسخ که ای ماه چهر | | درودت ز من ، آفرین از سپهر | |
| | چه مایه شبان دیده اندر سِماک | | خروشان بُدم پیش یزدان پاک | |
| | همی خواستم تا خدای جهان | | نُماید مرا روی تو در نِهان | |
| | کنون شاد گشتم به آواز تو | | بدین چرب گفتار با ناز تو | |
| | یکی چاره ی راه دیدار جوی | | چه پرسی تو بر باره و من به کوی | |
| 520 | پری روی گفتِ سپهبد شنود | | ز سر شَعر گلنار بگشاد زود | |
| | کمندی گشاد او ز سرو بلند | | که از مشک از آن سان نپیچد کمند | |
| | خم اندر خم و مار بر مار بر | | بران غبغبش نار بر نار بر | |
| | بدو گفت بریاز و برکش میان | | بر شیر بگشای و چنگ کَیان | |
| | بگیر این سیه گیسو از یکسوام | | ز بهر تو باید همی گیسوام | |
| 525 | نگه کرد زال اندر آن ماه روی | | شِگِفتی بماند اندر آن روی و موی | |
| | چُنین داد پاسخ که این نیست داد | | چُنین روز ، خورشید روشن مباد | |
| | که من دست را خیره در جان زنم | | برین خسته دل ، نوک پیکان زنم | |
| | کمند از رهی بستد و داد خم | | بینداخت خوار و نزد هیچ دم | |
| | به حلقه درآمد سر کنگره | | برآمد ز بُن تا به سر یکسره | |
| 530 | چو بر بام آن باره ی شست باز | | برآمد ، پری روی بردش نماز | |
| | گرفت آن زمان دست دستان به دست | | برفتند هر دو بکردار مست | |
| | فرود آمد از بام ِکاخ ِبلند | | به دست اندرون دستِ شاخ ِبلند | |
| | سُوی خانه ی زرنگار آمدند | | بدان مجلس شاهوار آمدند | |
| | بهشتی بُد آراسته پر ز نور | | پرستنده بر پای و در پیش حور | |
| 535 | شِگِفتی بماند اندرو زال زر | | بدان روی و آن موی و بالای و فر | |
| | ابا یاره و طوق و با گوشوار | | ز دیبا و گوهر چو باغ بهار | |
| | دو رخساره چون لاله اندر سمن | | سر ِزلفِ جعدش شکن بر شکن | |
| | همان زال با فرّ شاهنشهی | | نشسته بر ماه بر فرّهی | |
| | حمایل یکی دشنه اندر برش | | ز یاقوت رخشان سر و افسرش | |
| 540 | همه بود بوس و کنار و نبید | | مگر شیر کو گور را نشکرید | |
| | سپهبد چُنین گفت با ماه روی | | که ای سرو سیمین ، پر از رنگ و بوی | |
| | منوچهر چون بشنود داستان | | نباشد بدین کار همداستان | |
| | همان سام نیرم برآرد خروش | | کف اندازد و بر من آید به جوش | |
| | ولیکن سر ِمایه جانست و تن | | همان خوار گیرم بپوشم کفن | |
| 545 | پذیرفتم از دادگر داورم | | که هرگز ز پیمان تو نگذرم | |
| | شوم پیش یزدان ستایش کنم | | چو ایزد پرستان نیایش کنم | |
| | مگر کو دل سام و شاه زَمین | | بشوید ز خشم و ز پیگار و کین | |
| | جهان آفرین بشنود گفت من | | مگر کاشکارا شوی جفت من | |
| | بدو گفت رودابه من همچنین | | پذیرفتم از داور داد و دین | |
| 550 | که بر من نباشد کسی پادشا | | جهان آفرین بر زبانم گوا | |
| | جز از پهلوان جهان زال زر | | که با تخت و تاجست و با زیب و فر | |
| | | | | |
| | همی هر زمان مهرشان بیش بود | | خرد دور بود ، آز در پیش بود | |
| | چُنین تا سپیده برآمد ز جای | | تبیره برآمد ز پرده سرای | |
| | پس آن ماه را شاه پَدرود کرد | | بر خویش تار و برش پود کرد | |
| 555 | [ سر میژه کردند هر دو پر آب | | زبان برگشادند بر آفتاب ] | |
| | ز بالا کمند اندرافگند زال | | فرود آمد از کاخ ِفرّخ هَمال | |
| | | | | |
| | چو خورشید تابان برآمد ز کوه | | برفتند گردان همه همگروه | |
| | بدیدند مر پهلوان را به گاه | | وُزانجایگه برگرفتند راه | |
| | سپهبد فرستاد خواننده را | | که خواند بزرگان داننده را | |
| 560 | چو دستور فرزانه با موبدان | | سرافراز گردان و فرّخ ردان | |
| | زبان تیز بگشاد دستان سام | | لبی پر ز خنده دلی شادکام | |
| | نُخُست آفرین بر جهاندار کرد | | که بخت چُنان خفته بیدار کرد | |
| | چُنین گفت کز داور داد و پاک | | دل ما پر از ترس و اومید و باک | |
| | به بخشایش اومید و ترس از گناه | | به فرمان ها ژرف کردن نگاه | |
| 565 | ستودن مرو را چُنان چون توان | | شب و روز بودن به پیشش نوان | |
| | خداوند گردنده خورشید و ماه | | روان را به نیکی نُماینده راه | |
| | بدویست گیهان خرّم بپای | | همو داد و داور به هر دو سرای | |
| | بهار آرد و تیرماه و خزان | | برآرد پر از میوه دار و رزان | |
| | جوان داردش گاه با رنگ و بوی | | گهش پیر بینی دژم کرده روی | |
| 570 | ز فرمان و رایش کسی نگذرد | | پی مور بی او زَمین نسپَرد | |
| | بدانگه که لوح آفرید و قلم | | بزد بر همه بودنی ها رقم | |
| | جهان را فزایش ز جفت آفرید | | که از یک فزونی نیامد پدید | |
| | یکی نیست جز داور کردگار | | که ا. را نه انباز و نه جفت و یار | |
| | هرآنچ آفریدهَ ست جفت آمدند | | گشاده ز راه نهفت آمدند | |
| 575 | ز چرخ برین اندرآری سَخُن | | سراسر هم اینست گیتی به بُن | |
| | زمانه به مردم شد آراسته | | وُزو ارج گیرد همه خواسته | |
| | اگر نیستی جفتی اندر جهان | | بماندی توانایی اندر نِهان | |
| | وُدیگر که بی مایه ، دین خدای | | ندیدم ، مرد جوان را ، بجای | |
| | بویژه که باشد ز تخم بزرگ | | چو بی جفت باشد نماند سُتُرگ | |
| 580 | چه نیکوتر از پهلوان جوان | | که گردد به فرزند روشن روان | |
| | چو هنگام رفتن فرازآیدش | | به فرزند نوروز بازآیدش | |
| | به گیتی بماند به فرزند نام | | که این پور زال ست و آن پور سام | |
| | بدو گردد آراسته تاج و تخت | | ازو رفته نام و بدین مانده بخت | |
| | کنون این همه داستان من ست | | گل و نرگس و بوستان من ست | |
| 585 | دل از من رمیدهَ ست و برده خرد | | شما بنگرید این چه درمان برد | |
| | نگفتم من این تا نگشتم غمی | | به مغز و خرد درنیامد کمی | |
| | همه کاخ مهراب مهر من ست | | زَمینش چو گردان سپهر من ست | |
| | دلم گشت با دخت سیندخت رام | | چه گویید ؟ باشد بدین رام سام ؟ | |
| | شود تیز ، گویی منوچهر شاه ؟ | | جوانی گمانی برد گر گناه ؟ | |
| 590 | چه مهتر چه کهتر چو شد جفت جوی | | سُوی دین و آیین نهاده ست روی | |
| | بدین در خردمند را جنگ نیست | | که هم راه دین ست و هم ننگ نیست | |
| | | | | |
| | چه گوید کنون موبد پیش بین ؟ | | چه رانند فرزانگان اندرین ؟ | |
| | | | | |
| | ببستند لب موبدان و ردان | | سخن بسته شد بر لب بخردان | |
| | که ضحّاک مهراب را بُد نیا | | دل شاه ازیشان پر از کیمیا | |
| 595 | گشاده ، سخن کس نیارَست گفت | | که نشنید کس نوش با زهر جفت | |
| | چو نشنید ازیشان سپهبد سَخُن | | بجوشید و رای نو افگند بُن | |
| | که دانم ازین چون پژوهش کنید | | بدین رای بر من نکوهش کنید | |
| | ولیکن هرآن کو گزیند منش | | بباید شنیدش بسی سرزنش | |
| | مرا گر برین ره نمایش کنید | | وُزین بند راه گشایش کنید | |
| 600 | بجای شما آن کنم در نِهان | | که با کهتران کس نکرد از مِهان | |
| | | | | |
| | همه موبدان پاسخ آراستند | | همه کام و آرام او خواستند | |
| | که ما مر ترا یک بیک بنده ییم | | نه از بس شِگِفتی سرافگنده ییم | |
| | که بودهَ ست ازین کمتر و بیشتر | | به زن پادشا را نکاهد هنر | |
| | ابا آنک مهراب ازین پایه نیست | | بزرگست و گرد و سبک مایه نیست | |
| 605 | همان ست کز گوهر اَژدَهاست | | وُگر چند بر تازیان پادشاست | |
| | اگر شاه را بد نگردد گمان | | نباشد ازو ننگ بر دودمان | |
| | یکی نامه باید سُوی پهلَوان | | چُنان چون تو دانی به روشن روان | |
| | ترا خود خرد زان ِما بیشتر | | روان و گُمانت به اندیشتر | |
| | مگر کو یکی نامه نزدیک شاه | | فرستد کند رای او را نگاه | |
| 610 | منوچهر هم رای سام سُوار | | نه بردارد از ره بدین مایه کار | |