| | کنون پُر شگفتی یکی داستان | | بپیوندم از گفته ی باستان | |
| | نگه کن که مر سام را روزگار | | چه بازی نُمود ای پسر گوش دار | |
| | نبود ایچ فرزند مرسام را | | دلش بود جوینده ی کام را | |
| | نگاری بُد اندر شبستان اوی | | ز گلبرگ رخ داشت و ز مُشک موی | |
| 45 | از آن ماهش اومید فرزند بود | | که خورشید چهره بَرومند بود | |
| | ز مادر جدا شد بدان چند روز | | نگاری چو خورشید گیتی فروز | |
| | به چهره نکو بود برسان شید | | ولیکن همه موی بودش سپید | |
| | پسر چون ز مادر برین گونه زاد | | نکردند یک هفته بر سام یاد | |
| | شبستان آن نامور پهلَوان | | همه پیش آن خُرد کودک نَوان | |
| 50 | کسی سام یل را نیارَست گفت | | که فرزند پیر آمد از خوب جفت | |
| | یکی دایه بودش بکردار شیر | | بر ِپهلَوان اندرآمد دلیر | |
| | که بر سام یل روز فرخنده باد | | دل بدسِگالان او کنده باد | |
| | پس پرده اندر یل نامجوی | | یکی پاک پور آمد از ماه روی | |
| | تنش نقره ی پاک و رخ چون بهشت | | برو بر نبینی یک اندام زشت | |
| 55 | از آهو همان که ش سپیدست موی | | چُنین بود بخش تو ای نامجوی | |
| | فرود آمد از تخت سام سُوار | | به پردهَ نْدرآمد سُوی نوبهار | |
| | چو فرزند را دید مویش سَپید | | ببود از جهان سربسر نا امید | |
| | سوی آسمان سر برآورد راست | | ابا کردگار او به پَیگار خواست | |
| | که ای برتر از کژّی و کاستی | | بهی زان فزاید که تو خواستی | |
| 60 | اگر من گناهی گران کرده ام | | وُگر کیش آهَرمَن آورده ام | |
| | به پوزش مگر کردگار جهان | | به من بر ببخشاید اندر نِهان | |
| | بپیچد همی تیره جانم ز شرم | | بجوشد همی در دلم خون گرم | |
| | ازین بچّه چون بچّه ی اَهرِمَن | | سیه پیکر و موی سر چون سمن | |
| | چو آیند و پرسند گردنکَشان | | چه گویم ازین بچّه ی بدنشان | |
| 65 | چه گویم که این بچّه ی دیو چیست | | پلنگ دو رنگست گر بربریست | |
| | ازین ننگ بگذارم ایران زَمین | | نخوانم برین بوم و بر آفرین | |
| | بفرمود پس تاش برداشتند | | از آن بوم و بر دور بگذاشتند | |
| | بجایی که سیمرغ را خانه بود | | بدان خانه آن خرد بیگانه بود | |
| | نهادند بر کوه و گشتند باز | | برآمد برین روزگاری دراز | |
| 70 | چُنان پهلوان زاده ی بی گناه | | ندانست رنگ سَپید و سیاه | |
| | پدر مهر و پیوند بفگند خوار | | جفا کرد با کودک شیرخوار | |
| | یکی داستان زد برین شیر پیر | | کجا کرده بد بچّه را سیر شیر | |
| | که گر من ترا خون دل دادمی | | سپاس ایچ بر سرت ننهادمی | |
| | که تو خود مرا ویژه خون دلی | | دلم بگسلد گر زمن بگسلی | |
| 75 | چو سیمرغ را بچّه شد گرسنه | | به پرواز برشد دمان از بنه | |
| | یکی شیرخواره خروشنده دید | | زمین را چو دریای جوشنده دید | |
| | ز خاراش گهواره و دایه خاک | | تن از جامه دور و لب از شیر پاک | |
| | به گِرد اندرش تیره خاک نژند | | به سربرش خورشید گشته بلند | |
| | پلنگش بُدی کاجکی مام و باب | | مگر سایه یی یافتی زآفتاب | |
| 80 | فرود آمد از ابر سیمرغ و چنگ | | بزد برگرفتش از آن گرم سنگ | |
| | ببردش دمان تا به البرز کوه | | که بودش بر آنجا کُنام ِگروه | |
| | سُوی بچّگان برد تا بشکرند | | بدان ناله ی زار او ننگرند | |
| | ببخشود یزدان نیکی دِهش | | همه بودنی داشت اندر روش | |
| | نگه کرد سیمرغ با بچّگان | | بدان خُرد خون از دو دیده چکان | |
| 85 | شِگفتی ، بدوبر فگندند مهر | | بماندند خیره در آن خوبچهر | |
| | شکاری که نازک تر آن برگزید | | بدو داد تا او به لب می مزید | |
| | برین گونه تا روزگاری دراز | | برآورد دارنده بگشاد راز | |
| | چُن آن کودکِ خُرد پر مایه گشت | | بران کوه بر کاروان ها گذشت | |
| | یکی مرد شد چون یکی زادسرو | | برش کوه سیم و میانش چو غَرو | |
| 90 | نشانش پراگنده شد در جهان | | بد و نیک هرگز نماند نِهان | |