| | منوچهر یک هفته با درد بود | | دو چشمش پرآب و رُخَش زرد بود | |
| | به هشتم بیامد منوچهر شاه | | به سر برنهاد آن کیانی کلاه | |
| | همه جادوی ها به افسون ببست | | برو سالیان انجمن شد دو شست | |
| | همه پهلوانان روی زَمین | | برو یکسره خواندند آفرین | |
| 5 | چو دیهیم شاهی به سر برنهاد | | جهان را سراسر همه مژده داد : | |
| | به داد و دِهشن و به مردانگی | | به نیکی و پاکی و فرزانگی | |
| | منم گفت بر تخت ، گَردان سپهر | | هَمَم خشم و جنگست و هم داد و مهر | |
| | زَمین بنده و چرخ یار منست | | سر ِتاجداران شکار منست | |
| | همَمَ دین و هم فرّهِ ایزدی | | همَمَ بخت نیکی و دست بدی | |
| 10 | شب تار جوینده ی کین منم | | همان آتش ِتیز ِبُرزین منم | |
| | خداوند شمشیر و زرّینه کفش | | فرازنده ی کاویانی دِرفش | |
| | فروزنده ی تیغ و برّنده میغ | | به کین اندرون جان ندارم دریغ | |
| | گه بزم دریا دو دست منست | | دَم آتش از برنشست منست | |
| | بدان را ز بد دست کوته کنم | | زَمین را به کین رنگ دیبه کنم | |
| 15 | گراینده گرز و نُماینده تاج | | فزاینده ی داد بر تخت عاج | |
| | ابا این هنرها یکی بنده ام | | جهان آفرین را ستاینده ام | |
| | به راه فریدون فرّخ رویم | | نیامان کَهُن بود گر ما نویم | |
| | همه دست بر روی خندان زنیم | | همه داستان ها ز یزدان زنیم | |
| | کزو تاج و تخت ست و زومان سپاه | | بدومان امید و بدومان پناه | |
| 20 | هر آنکس که در هفت کشور زَمین | | بگردد ز راه و بتابد ز دین | |
| | نماینده ی رنج ، درویش را | | زبون داشتن مردم خویش را | |
| | برافراختن سر به بیشی و گنج | | به رنجور مردم نُماینده رنج | |
| | همه سربسر نزد من کافرند | | از آهَرمَن بدکُنش بتّرند | |
| | هر آن دین وری کو برین دین بود | | ز یزدان و از منْش نفرین بود | |
| 25 | وُزان پس به شمشیر یازیم دست | | کنم سر بسر کشور از کشته پست | |
| | همه پهلوانان پاکیزه دین | | منوچهر را خواندند آفرین | |
| | که فرّخ نیای تو این دید راه | | ترا داد آیین تخت و کلاه | |
| | ترا باد جاوید تخت ردان | | همان تاج و هم فرّهِ موبدان | |
| | دل ما یکایک به فرمان تست | | همه جان ما جای پیمان تست | |
| 30 | جهان پهلوان سام بر پای خاست | | چُنین گفت کای خسرو داد و راست | |
| | ز شاهان مرا دیده بر دیدن ست | | ز تو داد و ز من پسندیدن ست | |
| | پدر بر پدر شاه ایران تویی | | گُزین سُواران و شیران تویی | |
| | دلت شادمان ، بخت بیدار باد | | برین هَمْت ایزد نگهدار باد | |
| | تو از باستان یادگار منی | | به تخت کیی بر نگار منی | |
| 35 | به بزم اندرون شید تابنده یی | | به رزم اندرون شیر پاینده یی | |
| | زَمین و زمان خاک پای تو باد | | همان تخت پیروزه جای تو باد | |
| | چو شستی به شمشیر هندی زمین | | به آرام بنشین و رامش گزین | |
| | ازین پس همه نوبت ماست رزم | | ترا جای تخت ست و بِگماز و بزم | |
| | مرا پهلوانی نیای تو داد | | دلم را خرد هوش و رای تو داد | |
| 40 | پس از پیش تختش گرازید سام | | پسش پهلوانان نهادند گام | |