| | یکی پور زاد آن هنرمند ماه | | چگونه ؟ سزاوار تخت و کلاه | |
| | چُن از مادر مهربان شد جدا | | سبک تاختندش بر پادشا | |
| | برنده بدو گفت کای تاجور | | یکی شادکن دل به ایرج نگر | |
| | جهان بخش را لب پر از خنده شد | | تو گفتی مگر ایرجش زنده شد | |
| 585 | گرفت آن گرانمایه را برکنار | | نیایش همی کرد با کردگار | |
| | همی گفت کین روز فرخنده باد | | دل بدسگالان ما کنده باد | |
| | همان کز جهان آفرین کرد یاد | | ببخشود و دیده بدو باز داد | |
| | فِریدون چو روشن جهان را بدید | | به چهر وی اندر سبک بنگرید | |
| | چُنین گفت کز پاک مام و پدر | | یکی شاخ شایسته آمد به بر | |
| 590 | مَی روشن آمد ز پُرمایه جام | | مناچهره دارد منوچهر نام | |
| | چُنان پروردیدش که باد هوا | | برو برگذشتن ندیدی روا | |
| | پرستنده یی که ش به بر داشتی | | زمین را به پی هیچ نگذاشتی | |
| | به پای اندرش مُشک سارا بُدی | | روان بر سرش چتر دیبا بُدی | |
| | چُنین تا برآمد برو سالیان | | نیامدش ز اختر زمانی زیان | |
| 595 | هنرها که بُد پادشا را بکار | | بیاموختش نامور شهریار | |
| | چو چشم و دل پادشا باز شد | | سپه نیز با او هم آواز شد | |
| | نیا تخت زرّین و گرز گران | | بدو داد و پیروزه تاج سران | |
| | کلید در گنج های کَهُن | | بدو داد جمله ز سر تا به بُن | |
| | سراپرده ی دیبه از رنگ رنگ | | بدوی اندرون خیمه های پلنگ | |
| 600 | چه اسپان تازی به زرّین ستام | | چه شمشیر هندی به زرّین نیام | |
| | چه از جوشن و ترگ و رومی زره | | گشادند مر بندها را گره | |
| | کمان های چاچی و تیر خدنگ | | سپرهای چینی و ژوپین جنگ | |
| | برین گونه آراسته گنج ها | | کشیده به گرد اندرون رنج ها | |
| | سراسر سَزای منوچهر دید | | دل خویش را زو پر از مهر دید | |
| 605 | کلید در گنج ِآراسته | | به گنجور او داد و آن خواسته | |
| | همه پهلوانان لَشکرش را | | همه نامداران کشورش را | |
| | بفرمود تا پیش اوی آمدند | | همه با دل ِکینه جوی آمدند | |
| | به شاهی برو آفرین خواندند | | زَبَرجد به تاجش برافشاندند | |
| | چو جشنی بُد این روزگار بزرگ | | شده در جهان میش پیدا ز گرگ | |
| 610 | سپهدار چون قارن کاویان | | سپه کَش چو شیروی و چون اندیان | |
| | چو شد ساخته کار لشکر همه | | برآمد سر شهریار از رمه | |
| | به سلم و به تور آمد این آگهی | | که شد روشن آن تخت شاهنشهی | |
| | دل هر دو بیداد شد پر نِهیب | | که اختر همی رفت سوی نِشیب | |
| | نشستند هر دو به اندیشگان | | شده تیره روز جفاپیشگان | |
| 615 | یکایک بران رایشان شد درست | | کزان رویشان چاره بایست جست | |
| | که سوی فِریدون فرستند کس | | به پوزش ، کجا چاره این بود بس | |
| | بجستند از آن انجمن هردوان | | یکی پاک دل مرد چیره زبان | |
| | بدان مرد باهوش و بارای و سنگ | | بگفتند با لابه و نام و ننگ | |
| | در گنج خاور گشادند باز | | بدیدند هول نِشیب از فراز | |
| 620 | ز گنج کَهُن تاج زر خواستند | | همه پشت پیلان بیاراستند | |
| | به گردون ها بر چه مشک و عبیر | | چه دیبا و دینار و خزّ و حریر | |
| | [ اَبا پیل گردون کش و رنگ و بوی | | ز خاور به ایران نهادند روی ] | |
| | [ هر آنکس که بُد بر در شهریار | | یکایک فرستادشان یادگار ] | |
| | چو پردخته شدْشان دل از خواسته | | فرستاده آمد برآراسته | |
| 625 | چو دادند نزد فِریدون پیام | | نُخُست از جهاندار بردند نام | |
| | که جاوید باد آفْرِیدون گُرد | | که فرّ ِکیی ایزد او را سپرد | |
| | سرش سبز باد و تنش ارجمند | | منش برگذشته ز چرخ بلند | |
| | بگو کان دو بدخواه بیدادگر | | پر از آب دیده ز شرم پدر | |
| | پشیمان شده ، داغ دل ، پرگناه ، | | همی سوی پوزش نیابند راه | |
| 630 | پیامی گزارم ز هر دو رهی | | بدین برزدرگاه شاهنشهی | |
| | ازیرا که خود چشم ایشان نبود | | که گفتارشان کس بیارد شُنود | |
| | چه گفتند دانندگان خرَد | | که هر کس که بد کرد کیفر برَد | |
| | بماند به تیمار ، دل پر ز درد ، | | چو ما مانده ایم ، ای شه زادمرد | |
| | نبشته چُنین بودمان از بُوِش | | به رسم بُوِش اندرآمد رَوش | |
| 635 | هِزبر جهانسوز و نر اَژدَها | | ز دام قضا هم نیابد رها | |
| | وُ دیگر که بی باک و ناپاک دیو | | ببُرّد ز دل ترس گیهان خدیو | |
| | به ما بر چُنان چیره شد رای اوی | | که مغز دو فرزانه شد جای اوی | |
| | همی چشم داریم از آن تاجور | | که بخشایش آرد به ما بر مگر | |
| | اگر چه بزرگست ما را گناه | | به بی دانشی برنهد پیشگاه | |
| 640 | وُ دیگر بهانه سپهر بلند | | که گاهی پناهست و گاهی گزند | |
| | سیم : دیو کاندر میان چون نَوند | | میان بسته دارد ز بهر گزند | |
| | اگر پادشا را سر از کین ما | | شود پاک ، روشن شود دین ما | |
| | منوچهر را با سپاه گران | | فرستد به نزدیک خواهشگران | |
| | بدان تا چو بنده به پیشش به پای | | بباشیم جاوید ، اینست رای | |
| 645 | مگر کان درختی که از کین برُست | | به آب دو دیده توانیم شست | |
| | بپوییم تا آب و رنجش دهیم | | چو تازه شود تاج و گنجش دهیم | |
| | فرستاده آمد دلی پر سَخُن | | سَخُن را نه سر بود پیدا نه بُن | |
| | ابا پیل و با گنج و با خواسته | | به درگاه شاه آمد آراسته | |
| | به شاه آفْرِیدون رسید آگهی | | بفرمود تا تخت شاهنشهی | |
| 650 | به دیبای چینی بیاراستند | | کلاه کَیانی بپیراستند | |
| | نشست از بر تختِ پیروزه شاه | | چو سرو سهی بر سرش گرد ماه | |
| | ابا تاج و با طوق و با گوشوار | | چُنان چون بود در خور شهریار | |
| | خجسته منوچهر بر دست شاه | | نشسته ، نهاده به سر بر کلاه | |
| | دو رویه بزرگان کشیده رده | | سراپای یکسر به زر آزده | |
| 655 | به زرّین عُمود و به زرّین سپر | | زَمین کرده خورشیدگون سر بسر | |
| | به درگاه ایوان کشیده رده | | به طوق و به زنجیر ِزرّین دده | |
| | بیک دست بربسته شیر و پلنگ | | بدست دگر زَنده پیلان جنگ | |
| | برون آمد از کاخ شاپور گُرد | | فرستاده ی سلم را پیش بُرد | |
| | فرستاده چون دید درگاه شاه | | پیاده دوان اندرآمد ز راه | |
| 660 | چو نزدیک شاه آفْرِیدون رسید | | سر ِتخت و تاج بلندش بدید | |
| | ز بالا فرو برد سر پیش اوی | | همی بر زمین بر بمالید روی | |
| | گرانمایه شاه جهان کدخدای | | به کرسیّ زرّینْش بر کرد جای | |
| | فرستاده بر شاه کرد آفرین | | که ای نازش تاج و تخت و نگین | |
| | زمین گلشن از پایه ی تخت تُست | | هوا روشن از مایه ی بخت تُست | |
| 665 | همه بنده ی خاک پای توییم | | همه پاک زنده برای توییم | |
| | چو با آفرین شاه بگشاد چهر | | فرستاده پیشش بگسترد مهر | |
| | پَیام دو خونی بگفتن گرفت | | همه راستی ها نِهفتن گرفت | |
| | گشاده زبان مرد بسیارهوش | | بدو داده شاه جهاندار گوش | |
| | ز کردار بد پوزش آراستن | | منوچهر را نزد خود خواستن | |
| 670 | میان بستن او را بسان رهی | | سِپُردن بدو تاج و تخت مِهی | |
| | خریدن ازو باز خون پدر | | به دیبا و دینار و تاج و کمر | |
| | فرستاده گفت و سپهبد شنید | | مر آن بند را پاسخ آمد کلید | |
| | چو بشنید شاه جهان کدخدای | | پیام دو فرزند ناپاک رای | |
| | یکایک به مرد گرانمایه گفت | | که خورشید را چون توانی نِهفت | |
| 675 | نِهان دل آن دو مرد پلید | | ز خورشید روشن تر آمد پدید | |
| | شنیدم همه هر چه گفتی سَخُن | | نگه کن که پاسخ چه یابی ز بُن | |
| | بگو آن دو بی شرم ناباک را | | دو بیداد و بد مهر و ناپاک را | |
| | که گفتار خیره نیرزد بچیز | | ازین در سَخُن خود نرانیم نیز | |
| | اگر بر منوچهرتان مهر خاست | | تن ایرج نامورْتان کجاست | |
| 680 | که کام دد و دام بودش نِهفت | | سرش را یکی تنگ تابوت جفت | |
| | کنون چون ز ایرج بپرداختید | | به کین منوچهر برساختید | |
| | نبینید رویش مگر با سپاه | | ز پولاد بر سر نِهاده کلاه | |
| | ابا گرز و با کاویانی دِرفش | | زمین کرده از سمّ اسپان بنفش | |
| | سپهدار چون قارن رزمخواه | | چو شاپور و نَستوه پشت سپاه | |
| 685 | به یکدست بر یادخسرو بپای | | چو شیروی شیراوزنْش رهنمای | |
| | به دست دگر سرو شاه یمن | | به پیش سپاه اندرون رای زن | |
| | درختی که از کین ایرج برُست | | به خون بار و برگش بخواهیم شست | |
| | از آن تا کنون کین او کس نخواست | | که پشت زمانه ندیدیم راست | |
| | نه خوب آمدی با دو فرزند خویش | | که من جنگ را کردمی دست پیش | |
| 690 | کنون زان درختی که دشمن بکند | | بَرومند شاخی برآمد بلند | |
| | بیاید کنون چون هِزبر ژیان | | به کین پدر تنگ بسته میان | |
| | ابا نامداران لَشکر بهم | | چو سام نریمان و کرشاسپ جم | |
| | سپاهی که از کوه تا کوه جای | | بگیرند و کوبند گیتی به پای | |
| | وُ دیگر که گفتند باید که شاه | | ز کین دل بشوید ، ببخشد گناه | |
| 695 | که بر ما چُنین گشت گَردان سپهر | | خرد خیره شد ، تیره شد جای ِمهر | |
| | شنیدم همین پوزش نابکار ؛ | | چه گفت آن جهانجوری نابردبار : | |
| | که هرکس که تخم جفا را بکشت | | نه خوش روز بیند ، نه خرّم بهشت | |
| | گر آمرزش آید ز یزدان پاک | | شما را ز خون ِبرادر چه باک | |
| | هر آنکس که دارد روانش خرد | | گناه آن سِگالد که پوزش برد | |
| 700 | ز روشن جهاندارتْان نیست شرم | | سیه دل ، زبان پر ز گفتار گرم | |
| | مکافات آن بد به هر دو جهان | | بیابید و این هم نماند نِهان | |
| | سدیگر فرستادن تخت آج | | برین زَنده پیلان و پیروزه تاج | |
| | بدین بدره های کَهُن گونه گون | | نجوییم کین و بشوییم خون | |
| | سر تاجداران فروشم به زر | | که مه تخت بادا مه تاج و مه فر | |
| 705 | سر بی بها را ستاند بها | | مگر بتّر بچّه ی اَژدَها | |
| | که گوید که جان گرامی پسر | | بهایی کند پیر گشته پدر | |
| | بدین خواسته نیست ما را نیاز | | سَخُن چند گوییم چندین براز | |
| | پدر تا بود زنده با پیرسر | | بدین کین نخواهد گشادن کمر | |
| | پَیامت شنیدم تو پاسخ شنو | | یکایک بگوی و بزودی برو | |
| 710 | فرستاده آن هول گفتار دید | | نشست منوچهر سالار دید | |
| | بپژمرد و برخاست لرزان ز جای | | همانگه به زین اندرآورد پای | |
| | همه بودنی ها به روشن روان | | بدید آن گرانمایه مرد جوان | |
| | که با تور و با سلم گَردان سپهر | | نه بس دیر چین اندرآرد به چهر | |
| | بیامد بکردار باد دمان | | سری پُر ز پاسخ ، دلی پرگُمان | |
| 715 | به دیدار چون خاور آمد پدید | | به هامون کشیده سراپرده دید | |
| | بیامد به درگاه پرده سرای | | به پردَه نْدَرون بود خاورخدای | |
| | یکی خیمه ی پرنیان ساخته | | ستاره زده ، جای پرداخته | |
| | دو شاه دو کشور نشسته براز | | بگفتند کامد فرستاده باز | |
| | بیامد همانگاه سالار بار | | فرستاده را برد زی شهریار | |
| 720 | نشستن گهی نو بیاراستند | | ز شاه نوآیین خبر خواستند | |
| | بجستند هر گونه یی آگهی | | ز دیهیم و ز ِتخت شاهنشهی | |
| | ز شاه آفْرِیدون و از لَشکرش | | ز گردان جنگی و از کشورش | |
| | وُ دیگر ز کردار گَردان سپهر | | که دارد همی بر منوچهر مهر ؟ | |
| | بزرگان کدامند و دستور کیست ؟ | | چه مایه سْتشان گنج و گنجور کیست ؟ | |
| 725 | عِنان دار چندند و سالار که ؟ | | ز جنگاوران نامبُردار که ؟ | |
| | فرستاده گفت آنکه روشن بهار | | ندیده ست ، بیند درِ شهریار | |
| | بهاریست خرّم دراندر بهشت | | همه خاک عنبر ، همه زَرّ خشت | |
| | سپهر برین کاخ و میدان اوست | | بهشت گزین روی خندان اوست | |
| | به بالای ایوان او راغ نیست | | به پهنای میدان او باغ نیست | |
| 730 | چو رفتم بنزدیک ایوان فراز | | سرش با ستاره همی گفت راز | |
| | به یکدست پیل و به یکدست شیر | | جهان را به بخت اندرآورده زیر | |
| | ابر پشت پیلانْش بر تخت زر | | ز گوهر همه طوق شیران نر | |
| | تبیره زنان پیش پیلان بپای | | ز هر سو خروشیدن کَرَّه نای | |
| | تو گفتی که میدان بجوشد همی | | زَمین باسمان برخورشد همی | |
| 735 | خِرامان شدم پیش آن ارجمند | | یکی تخت پیروزه دیدم بلند | |
| | نشسته برو شهریاری چو ماه | | ز یاقوت رخشان به سر بر کلاه | |
| | چو کافور موی و چو گلبرگ روی | | دل آزرم جوی و زبان گرم گوی | |
| | جهان را ازو دل به ترس و امید | | تو گفتی مگر زنده شد جمّشید | |
| | منوچهر چون زاد سرو بلند | | بکردار طهمورتِ دیوبند | |
| 740 | نشسته بر شاه بر دست راست | | تو گویی زبان و دل پادشاست | |
| | به پیش اَندرش قارن رزم زن | | به دست چپش سرو شاه یمن | |
| | چو شاه یمن سرو دستورشان | | چو پیروز کرشاسپ گنجورشان | |
| | شمار در گنج ها ناپدید | | کس اندر جهان آن بزرگی ندید | |
| | همه گِرد ایوان دو رویه سپاه | | به زرّین عُمود و به زرّین کلاه | |
| 745 | سپهدار چون قارن کاویان | | به پیش سپاه اندرون آندیان | |
| | مبارز چو شیروی درّنده شیر | | چو شاپور یل زَنده پیل دِلیر | |
| | چُنو بست بر کوهه ی پیل کوس | | هوا گردد از گَرد چون آبنوس | |
| | گر آیند زی ما به جنگ آن گروه | | شود کوه هامون و هامون چو کوه | |
| | همه دل پر از کین و پُرچین بَروی | | بجز جنگشان نیست چیز آرزوی | |
| 750 | بریشان همه برشمرد آنچ دید | | سَخُن نیز کز آفْرِیدون شنید | |
| | دو مرد جفاپیشه را دل ز درد | | بپیچید و شد رویشان لاژورد | |
| | نشستند و جُستند هرگونه رای | | سَخُن را نه سر بود پیدا نه پای | |
| | به سلم بزرگ آنگهی تور گفت | | که آرام و شادی بباید نِهفت | |
| | نباید که آن بچّه ی نرّه شیر | | شود تیزدندان و گردد دِلیر | |
| 755 | چُنان نامور بی هنر چون بود | | که ش آموزگار آفْرِیدون بود | |
| | نبیره چو شد رای زن با نیا | | از آنجایگه بردمد کیمیا | |
| | بباید بسیچید ما را به جنگ | | شتاب آوریدن بجای درنگ | |
| | ز لَشکر سُواران برون تاختند | | ز چین و ز خاور سپه ساختند | |
| | فتاد اندرآن بوم و بر گفت وگوی | | جهانی بدیشان نِهادند روی | |
| 760 | سپاهی که آنرا کرانه نبود | | بَد آن بُد که اختر جوانه نبود | |
| | دو لشکر زخاور به ایران کشید | | به خَفتان و خود اندرون ناپدید | |
| | ابا زَنده پیلان و با خواسته | | دو خونی به کینه دل آراسته | |